Friday, October 11, 2013

गुरु का ताल


गुरु अर्जुनदेव का शहीदी स्थल - गुरु का ताल

   आज न जाने क्यों अपना ही शहर घूमने का ख्याल दिल में आया, सोचा दूर दूर से लोग जिस शहर को देखने आते हैं उसी शहर को छोड़ हम दूसरी जगहों पर जाते हैं और पाते हैं कि एक बार आगरा आना इस इस देश के हर इंसान का सपना है, और हो भी क्यों ना जब स्वर्ग में जिस महल की बुनियाद रखी गई हो और मोहब्बत के नाम पर जिसे जमीं  पे उतारा गया हो और उसकी ताजगी के नाम पर उसे ताज महल पुकारा गया हो उसे कौन नहीं देखना चाहेगा । 
 
     पर आज मैं आपको ताजमहल नहीं, आगरा की उन जगहों पर जाऊंगा जहाँ शायद ही लोग जाना पसंद करते हैं, उन जगहों में सबसे पहले मेरी यात्रा वाहेगुरु का नाम लेकर आगरा के प्रसिद्द गुरुद्वारा, गुरु का ताल से प्रारम्भ करूँगा। 


Thursday, October 10, 2013

सारनाथ दर्शन


सारनाथ दर्शन 

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     माँ को वाराणसी स्टेशन पर छोड़कर मैं एक पैसेंजर ट्रेन के जरिये सारनाथ पहुँच गया, सबसे पहले स्टेशन के शाइन बोर्ड को देखा, यह और स्टेशनों की अपेक्षा कुछ अलग लगा फिर ध्यान आया कि मैं महात्मा बुद्ध की भूमि में हूँ और उन्ही के धम्म के अनुसार रेलवे ने इस स्टेशन का बोर्ड भी बनाया है। सारनाथ पूर्वोत्तर रेलवे का एक छोटा सा स्टेशन है परन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण भी है।

Monday, October 7, 2013

पहली काशी यात्रा

पहली काशी यात्रा 


    अभी एक महीना ही हुआ था इलाहाबाद से लौटे हुए कि दुबारा रेलवे का कॉल लैटर आ गया,  इसबार यह मेरे नाम से आया था। सेंटर इलाहाबाद में ही था इसलिए एक इलाहाबाद की टिकिट बुक करा ली, इसबार मेरी माँ मेरे साथ इलाहाबाद जा रही थी, उनका भी पी टी ओ पापाजी बनवा दिया और इलाहाबाद की एक और टिकिट बुक हो गई ।

    एग्जाम से एक दिन पहले ही हम इलाहाबाद के लिए निकल लिए, दुसरे दिन हम इलाहाबाद में थे स्टेशन पर काफी लड़कों की भीड़ थी जिन्हे देखकर यह एहसास दिल को हुआ कि इस देश के अंदर एक अकेले हम ही बेरोजगार नहीं थे, हमारे जैसे जाने कितने ही न थे जो आज मुझे यहाँ देखने को मिले।

Sunday, September 8, 2013

बाड़मेर की तरफ़



जोधपुर से बाड़मेर और मुनाबाब रेल यात्रा 


BADMER RAILWAY STATION


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    आज मैंने पहली बार सूर्य नगरी में कदम रखा था। मैं जोधपुर स्टेशन पर आज पहली बार आया था, यहाँ अत्यधिक भीड़ थी। कारण था बाबा रामदेव का मेला, जो जोधपुर - जैसलमेर रेलमार्ग के रामदेवरा नामक स्टेशन के पास चल रहा था। मैंने इंटरनेट के जरिये यहाँ से जैसलमेर के लिए रिज़र्वेशन करवा लिया था किन्तु वेटिंग में, अब पता करना था कि टिकट कन्फर्म हुई या नहीं। मैंने पूछताछ केंद्र पर जाकर पुछा तो पता चला कि टिकिट रद्द हो गई थी, मेरा चार्ट में नाम नहीं था।

     मैं स्टेशन के बाहर आया और यहाँ के एक ढाबे पर खाना खाया। यहाँ मैंने देखा कि सड़क पर दोनों तरफ चारपाइयाँ ही चारपाइयाँ बिछी हुई हैं बाकायदा बिस्तर लगी हुई। किराया था एक रात का मात्र 40 रुपये। परन्तु इसबार मेरा सोने का कोई इरादा न था मुझे बाड़मेर पैसेंजर पकड़नी थी जो रात 11 बजे चलकर सुबह 5 बजे बाड़मेर पहुंचा देती है। इसप्रकार मैं बाड़मेर भी पहुँच जाऊँगा और रात भी कट जाएगी। मैंने ऐसा ही किया।

    बाड़मेर पैसेंजर से मैं सुबह पांच बजे ही बाड़मेर पहुँच गया, स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में नित्यक्रिया से फुर्सत होकर बाहर गया और एक राजस्थानी बाबा की दुकान पर दस रुपये वाली बाड़मेरी चाय पीकर आया। सुबह साढ़े सात बजे मुनाबाब लिए यहाँ से पैसेंजर जाती है, मुनाबाब जाने के लिए ट्रेन  स्टेशन पर तैयार खड़ी थी, तभी मैंने देखा कि मुनाबाब की ओर जाने वाली दूसरी लाइन के सिग्नल हरे हो रहे हैं, मतलब पैसेंजर से पहले कोई और ट्रेन  मुनाबाब की और जाने वाली थी जिसका स्टॉप बाड़मेर स्टेशन पर नहीं था, और जब ट्रेन हमारे सामने से गुजरी तो पता चला कि यह थार एक्सप्रेस थी जो कि पाकिस्तान वाले यात्रियों को लेकर मुनाबाब जा रही है ।

   थार एक्सप्रेस जोधपुर के भगत की कोठी स्टेशन से चलकर भारत देश के आखिरी स्टेशन मुनाबाब तक जाती है और मुनाबाब पर पाकिस्तान की दूसरी थार एक्सप्रेस आती है जो भारतीय थार एक्सप्रेस के यात्रियों को कराची लेकर जाती है। यह ट्रेन पूरी तरह से कवर्ड रहती है ।

     मैं अपनी पैसेंजर ट्रेन से मुनाबाब तक घूम आया, यह भारत का आखिरी रेलवे स्टेशन है इसके बाद रेलवे लाइन एल ओ सी पार करके पाकिस्तान में चली जाती है जहाँ हम नहीं जा सकते थे। यहाँ न कोई शहर था न कोई गांव, सिर्फ था तो केवल रेगिस्तान और भारतीय फ़ौज़ की चौकियां, यहाँ से पाकिस्तान महज एक किलोमीटर दूर था। मैं मुनाबाब देखकर वापस बाड़मेर आ गया और वहां से फिर जोधपुर। जोधपुर से शाम को मेरा हावड़ा एक्सप्रेस में रिजर्वेशन था दुसरे दिन मैं आगरा पहुँच गया।

जोधपुर  स्टेशन 

JODHPUR RAILWAY STATION


BADMER RAILWAY STATION

BADMER

BADMER

BHACHBHAR RAILWAY STATION

RAMSAR RLY. STATION

GAGRIYA RAILWAY STATION

GAGRIYA RAILWAY STATION

BADMER

BADMER

BADMER

BADMER

BADMER TO MUNAWAO

BADMER

BADMER

LEELMA RAILWAY STATION

BADMER

BADMER


MUNABAO RAILWAY STATION IND.

MUNABAO RAILWAY TIME TABLE

MUNABAO

MUNABAO

MUNABAO

MUNABAO RAILWAY STATION

MUNABAO

MUNABAO RLY STATION PAK

MUNABAO

MUNABAO RAILWAY STATION PAKISTAN

JAISINDER RAILWAY STATION

गडरा गांव विभाजन से पहले हिंदुस्तान की जमीन पर था, पर आज यह गांव पाकिस्तान में है और इस गांव का रेलवे स्टेशन आज भी भारत में ही है, रास्ता तो खो गया पर स्टेशन आज भी मौजूद है । और यही वो रेलवे स्टेशन जहाँ दुश्मनों ने रेलवे कर्मचारियों को मौत के  कर इस स्टेशन को आग लगा दी थी ।   

एक राजस्थानी महिला 

राजस्थान 

मुनाबाव - बाड़मेर पैसेंजर 

बाड़मेर  स्टेशन  
इस यात्रा के अन्य भाग :-



          

Saturday, September 7, 2013

अजमेर - जोधपुर पैसेंजर यात्रा



अजमेर - जोधपुर  पैसेंजर यात्रा

AJMER - JODHPUR PASSENGER


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    अजमेर से दोपहर दो बजे जोधपुर के लिए एक पैसेंजर चलती है जो मारवाड़ होते हुए शाम को जोधपुर पहुँच जाती है। इस पैसेंजर ट्रेन में रिजर्वेशन की सुविधा भी उपलब्ध है। मैंने आगरा में ही इस ट्रेन में अपना रिजर्वेशन करवा लिया था। दोपहर दो बजे तक मैं अजमेर स्टेशन पर था और ट्रेन भी अपने सही समय पर स्टेशन से चलने की तैयार खड़ी हुई थी। इसी बीच रानीखेत एक्सप्रेस भी आ चुकी थी। गर मेरा इस पैसेंजर में रिजर्वेशन न होता तो शायद मैं इसी ट्रेन से जोधपुर जाता।

Friday, September 6, 2013

अजमेर दर्शन और तारागढ़ किला


अजमेर दर्शन और तारागढ़ किला 


DARGAAH AJMER SHARIF


      एक अरसा बीत चुका था बाबा से मिले, तो सोचा क्यों न उनके दर पर इस बार हाजिरी लगा दी जाय। बस फिर क्या था, खजुराहो एक्सप्रेस में आरक्षण करवाया और निकल लिए अजमेर की ओर। मैं रात में ही अजमेर पहुँच गया, और वहां से फिर दरगाह। अभी बाबा के दरबाजे खुले नहीं थे, मेरी तरह बाबा के और भी बच्चे उनसे मिलने आये हुए थे जो उनके दरबाजे खुलने का इंतज़ार कर रहे थे, इत्तफाक से आज ईद भी थी। दरगाह का नज़ारा आज देखने लायक था ।

Monday, September 2, 2013

माँ शारदा देवी के दरबार में - मैहर यात्रा


माँ शारदा देवी के दरबार में - मैहर यात्रा 

MAIHAR RAILWAY STATION


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     मैहर धाम, इलाहाबाद - जबलपुर रेलवे लाइन पर मैहर स्टेशन के समीप है। माना जाता है कि यहाँ रात को पहाड़ पर देवी के मंदिर पर कोई भी नहीं रुक सकता है, यहाँ के लोगों का मानना है यहाँ आल्हा जो कि ऊदल के भाई होने के साथ साथ एक वीर योद्धा भी थे, आज भी देवी माँ कि पूजा सबसे पहले करने आते हैं। यह शक्तिपीठ बुंदेलखंड में स्थित है और आल्हा की भक्ति को समर्पित है। यहाँ आल्हा ने अपना सर काटकर देवी माँ के चरणों में चढ़ाया था। जिस कारण मंदिर कि सीढ़ियाँ चढ़ने से पहले आल्हा कि मूर्ति के दर्शन होते हैं जो भाला लिए हाथी पर सवार हैं।

Sunday, September 1, 2013

सतना की एक शाम



सतना की एक शाम 

KC ON SATNA RAILWAY STATION



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     इलाहबाद से हमने सतना जाने का विचार बनाया, इलाहाबाद से सतना का रास्ता तीन घंटे की दूरी पर था, जहाँ मेरा छोटा मौसेरा भाई गोपाल हमारा इंतज़ार कर रहा था। वो सतना में एल एन टी इंजीनियर है और एक होटल में रहता है। मैं और केसी इलाहाबाद स्टेशन पहुँचे, यहाँ आकर देखा तो एक बहुत ही लम्बी लाइन टिकट लेने के लिए लगी हुई थी, इतनी लम्बी लाइन में मेरे लगने की तो हिम्मत ही नहीं हुई। केसी कैसे भी करके टिकट ले आये और हमने कामायनी एक्सप्रेस में अपना स्थान जमाया।

बुंदेलखंड एक्सप्रेस से एक सफ़र


बुंदेलखंड एक्सप्रेस से एक सफ़र 

 
BUNDELKHAND EXPRESS ON PRAYAG JUNCTION


      मैं जब कभी किसी यात्रा पर जाता हूँ तो उसकी तैयारी महीने भर पहले से ही शुरू कर देता हूँ। अभी मैं अपनी राजस्थान यात्रा की तैयारी कर ही रहा था कि अचानक किशोरी लालजी का फोन आया, बोले भाई साहब इलाहाबाद चलना है। दरअसल किशोरीलाल जी मेरे बहनोई हैँ और नोयडा में नौकरी हैं, आज से दो साल पहले रेलवे का कोई फॉर्म भरा होगा आज उसी का कॉललैटर आया है। अब अचानक से किसी यात्रा की तैयारी करना मेरे लिए कोई कठिन काम नहीं था, बस मुश्किल था तो इलाहबाद जाने वाली किसी भी ट्रेन में उपलब्ध सीट का मिलना । 

Monday, July 29, 2013

श्योंपुर क़िला




श्योंपुर क़िला 


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      इस गर्मी के माह में भी मुझे बरसात की वजह से काफी ठण्ड का सामना करना पड़ा। श्योपुर स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने और दीपक ने एक सिगड़ी के किनारे बैठकर चाय पी। यह काफी अच्छी और मसालेदार चाय थी जिसकी कीमत थी मात्र पाँच रुपये। स्टेशन के ही ठीक सामने एक सड़क जाती है, यह सड़क कुन्नु राष्ट्रीय पार्क की ओर जाती है जो यहाँ से अभी काफी दूर था। समयाभाव के कारण हम वहाँ तक नहीं जा सकते थे। फिर भी हमने एक ऑटो वाले को रोककर पूछा - हाँ भाई यहाँ देखने को क्या है ? वो हमारी बात सुनकर थोडा अचरज में पड़ गया और बोला कि आप श्योपुर घूमने आये हो ? हमने कहा कि हाँ। वो हमारी बात सुनकर काफी खुश हुआ और बोला कि काश आपकी तरह मुझे ऐसे ही रोज पर्यटक मिले तो हमारे साथ साथ इस जिले ( श्योपुर ) का भी नाम दुनिया में मशहूर हो जाए । 

कुन्नु घाटी की एक रेल यात्रा




 श्योंपुर कलां की ओर 




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      कुन्नु घाटियों का असली नजारा सबलगढ़ के निकलने के बाद ही शुरू होता है। ट्रेन रामपहाड़ी, बिजयपुर रोड,कैमारा कलां होते हुए बीरपुर पहुंची। सबलगढ़ के बाद अगला मुख्य स्टेशन यही है, यहाँ आने से पहले ही  हो गया था, मतलब आसमान में घने काले बादलों की काली घटाएँ छाई हुईं थीं। ट्रेन की छत पर से बादल ऐसे नजर आ रहे थे जैसेकि अभी बरस पड़ेंगे, पर शायद आज बादलों को पता था कि मैं ट्रेन की छत पर और भीगने के सिवाय मुझपर कोई रास्ता ही नहीं बचेगा इसलिए आसमान में गरजते ही रहे। ट्रेन बीरपुर स्टेशन पहुंची, अब बादलों का धैर्य जबाब दे गया था, ट्रेन के स्टेशन पहुँचते ही बरस पड़े, मैं स्टेशन के टीन शैड के नीचे होकर केले खाता रहा, यहाँ केले आगरा की अपेक्षा काफी सस्ते थे और मुझे भूख भी काफी लगी हुई थी, दीपक भी मेरे साथ था। 

सबलगढ़ रेल यात्रा


सबलगढ़ रेल यात्रा 

सबलगढ़ में दीपक 


      यूँ तो किसी नई जगह जाने का विचार मन में कई बार आता है पर पूरा कब हो जाए यह तो ईश्वर ही जानता है। मेरे मन में पिछले कई दिनों से ग्वालियर - श्योंपुर नेरो गेज रेल यात्रा का विचार बन रहा था पर साथ के लिए मुझे किसी का सहयोग नहीं मिल रहा था इसलिए विचार, विचार ही बन कर रह जाता था। पर इस बार मेरे मौसेरे भाई दीपक की वजह से मेरा इस रेल यात्रा का सपना पूरा हो गया। कैसे ? आगे जानिये।

     दीपक और दिनेश मेरी मौसी के लड़के हैं और दोनों ही मुझसे छोटे हैं, दोनों ही ग्वालियर में नौकरी करते हैं। कल शाम को ही गाँव से ग्वालियर जाने के लिए आगरा आये थे, मैंने दीपक को इस रेल यात्रा पर चलने के लिए बताया, वह तुरंत चलने के लिए राजी हो गया। मैंने ग्वालियर से श्योंपुर जाने वाली ट्रेन का टाइम देखा सुबह 6:25 था यानी की हमें रात को तीन बजे ही किसी ट्रेन से ग्वालियर के लिए निकलना था, पर नींद का कोई भरोसा नहीं होता, सोते ही रह गए। सुबह आँख भी खुली तो घड़ी पांच बजा चुकी थी, अब तो ट्रेन मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। यह एक मात्र ट्रेन थी जो ग्वालिअर से सुबह चलकर शाम को श्योंपुर पहुँचती है। पर वो कहते है ना चाहो तो सब कुछ है आसान। बस यही बात दिमाग में आई और दिमाग ने काम करना शुरू कर दिया। अब आगे जानिये की यह ट्रेन मैंने कैसे पकड़ी ?

Saturday, July 6, 2013

लखनऊ की एक शाम

 लखनऊ की एक शाम 

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    हालाँकि मैं पूरी रात का जगा हुआ था सो ऊपर वाली सीट पर सो गया और जब उठा तो देखा ट्रेन लखनऊ शहर में दौड़ रही थी, रास्ते में कुछ स्टेशन पड़े। ट्रेन शाम को 4:30 बजे ट्रेन ऐशबाग स्टेशन पहुंची, मेरा रूहेलखंड एक्सप्रेस से सफ़र यही पर समाप्त हो गया। ट्रेन को अकेला छोड़कर मैं ऐशबाग से चारबाग की ओर चल दिया , और रूहेलखंड एक्सप्रेस खड़ी रही सुबह फिर किसी मेरे जैसे मुसाफिर को ले जाने के लिए कासगंज की ओर।


रूहेलखंड के नज़ारे



रूहेलखंड के नज़ारे 

रूहेलखंड एक्सप्रेस 


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    वैसे तो बरेली को रूहेलखंड ही कहा जाता है, पर असली रूहेलखंड के नज़ारे तो बरेली से आगे ही शुरू होते हैं। एक्सप्रेस अपनी रफ़्तार में दौड़ रही थी, ट्रेन में सभी यात्री रूहेलखंडी थे, उनकी भाषा से मुझे इस बात का आभास हुआ, वाकई उनकी भाषा बड़ी ही मिठास भरी थी। इधर चारों तरफ हरियाली ने मेरा मन मोह लिया था और मौसम भी सुहावना था, हल्की बारिश हो रही थी, तभी एक स्टेशन आया बिजौरिया। बारिश में हरियाली के साथ साथ मौसम ने वक़्त को काफी खुशनुमा बना दिया था। 

Friday, July 5, 2013

बरेली की यात्रा


 बरेली की यात्रा 

बरेली रेलवे स्टेशन 



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       सुबह का सफ़र बड़ा ही सुहावना होता है खासतौर पर सूरज निकलने से पहले, यूँ तो गर्मी के दिन थे पर मुझे सर्दी का अनुभव होने लगा था, ट्रेन अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी थोड़ी देर में एक वीराने में स्टेशन आया कासगंज सिटी। यूँ तो स्टेशन का नाम कासगंज सिटी है पर मुझे यहाँ कहीं भी सिटी जैसी कोई चीज़ नजर नहीं आयी, था तो सिर्फ वीराना और खेत खलिहान। ट्रेन एक एक्सप्रेस गाड़ी थी, सो बड़ी स्पीड के साथ स्टेशन से निकली मैं फोटू ही नहीं ले पाया।

रूहेलखंड एक्सप्रेस से एक सफ़र




कासगंज स्टेशन पर एक रात 

कासगंज जंक्शन रेलवे स्टेशन

    आज मेरा मन मीटर गेज की ट्रेन से यात्रा करने का था सो प्लान बना लिया कि कासगंज से गोंडा के रूट पर 
यात्रा की जाए। दिन गुरूवार था, आगरा कैंट से कोलकाता के लिए सुपरफास्ट जाती है कासगंज होकर जो रात 8 बजे कासगंज पहुँच जाती है और कासगंज से 9:15 pm पर बरेली तक जाती है और वहां से सुबह 4 बजे गोंडा के लिए पैसेंजर जाती है। प्लान तो अच्छा था लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, कोलकाता एक्सप्रेस आज चार घंटे लेट हो गई और गोंडा जाने का प्लान ठप्प हो गया। 

     रात बारह बजे कासगंज पहुंचा, सन्नाटा था, प्लेटफोर्म पर यात्री सोये पड़े थे शायद टनकपुर जा रहे थे। या फिर कानपुर की ओर। खैर अपनी मंजिल कुछ और ही थी। गोंडा की तो कोई ट्रेन नहीं थी लेकिन लखनऊ की थी रूहेलखंड एक्सप्रेस जो सुबह पांच बजे चलकर शाम को पांच बजे लखनऊ पहुँच जाती है, यानी बारह घंटे का सफ़र पर बहुत ही मजेदार । कैसे ? आगे जानिये । 

Sunday, June 23, 2013

अमृतसर




अमृतसर 

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    होशियारपुर से हम जालंधर पहुँच गए, यहाँ से हमें अमृतसर की तरफ जाना था, तभी अलाउंस हुआ कि अमृतसर जाने वाली हीराकुंड एक्सप्रेस कुछ ही समय में प्लेटफोर्म एक पर आ रही है। मैं और कुमार टिकट लेने पहुंचे, मुझे तो टिकट मिल गई परन्तु  कुमार टिकट लेता ही रह गया, मेरे पहुंचते ही ट्रेन चल दी और कुमार प्लेटफोर्म पर ट्रेन को अपने सामने जाते हुए देखता ही रह गया, खैर बाद में आ जायेगा। ट्रेन का जनरल डिब्बा एकदम खाली था, वर्ना आगरा में तो इस ट्रेन के जनरल डिब्बे में बैठने की तो क्या खड़े होने की भी जगह नहीं मिलती।

होशियारपुर




होशियारपुर रेलवे स्टेशन 

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    चिंतपूर्णी से सीधे ही पंजाब रोडवेज की एक बस होशियारपुर के लिए मिल गई, पहाडों की सीमा से बस मैदानी भाग की ओर जा रही थी। रास्ते में हिमाचल और पंजाब की सीमा का एक टोल प्लाजा भी मिला, पंजाब प्रान्त में आते ही सड़क एकदम शानदार हो गई। बस दौडती हुई होशियारपुर की तरफ आ रही थी, पंजाब की बात ही अलग होती है, बस स्टैंड से एक ऑटो द्वारा हम होशियारपुर स्टेशन पहुंचे, यह उत्तर रेलवे का इस रेल लाइन का आखिरी स्टेशन है।

Saturday, June 22, 2013

माँ छिन्नमस्तिका धाम




माँ छिन्नमस्तिका धाम

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     सुबह करीब दस बजे हम चिंतपूर्णी पहुँच गए, यहाँ चिंतपूर्णी देवी का मंदिर है जिसे छिन्मस्तिका धाम भी कहते हैं, यह ज्वालादेवी से करीब अड़तीस किमी दूर है। बस स्टैंड से उतर कर मंदिर जाने के लिए एक सीधी पक्की सड़क बनी है, मैं यहाँ पहली बार आया हूँ, यहाँ काफी बड़ा बाजार भी है और भक्तों की संख्या मुझे यहाँ सबसे अधिक दिखाई दे रही थी। यहाँ आते ही हमें एक जगह लंगर चलता हुआ मिला, पूड़ी सब्जी के साथ साथ खीर भी थी। हमने सबसे पहले माँ का यह प्रसाद ग्रहण किया और चल दिए देवी माँ के मंदिर की ओर , यहाँ भी मंजू ने लंगर खाने से इनकार कर दिया, न जाने क्यूँ उसे देवी माँ के इस प्रसाद से भी एलर्जी थी।

माँ ज्वालादेवी शक्तिपीठ धाम



माँ ज्वालादेवी शक्तिपीठ धाम

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    टेड़ा मंदिर से लौटकर मैं पहले होटल पहुंचा और कुछ देर आराम करने के बाद नहा धोकर माँ ज्वालादेवी के दर्शन के लिए चल पड़ा, ज्वाला देवी का मंदिर काफी बड़ा और साफ़ स्वच्छ बना हुआ है, शाम के समय यह और भी रमणीक हो जाता है, हम शाम के समय मंदिर में पहुंचे, और थोड़ी देर मंदिर के सामने खुले फर्श पर बैठे रहे मंदिर खुलने में अभी समय था, फिर भी भक्तों की कोई कमी नहीं थी, लाइन लगाकर खड़े हुए थे, जब मंदिर खुला तो हम सबने देवी माँ के दर्शन किये, दर्शन करने के बाद एक हॉल पड़ता है जिसमे अकबर द्वारा चढ़ाया हुआ सोने का छत्र रखा हुआ है।

Friday, June 21, 2013

टेड़ा मंदिर

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टेड़ा मंदिर 


        काँगड़ा का किला देखकर हम वापस आये, होटल पर सब तैयार मिले, मैंने जल्दी से होटल का चेकआउट कराया और नगरकोट धाम से ज्वालादेवी जी की ओर प्रस्थान किया। हमें हिमाचल की रोडवेज की एक बस मिल गई और हम ज्वालादेवी की तरफ चल दिए। यहाँ गंगादशहरा के अवसर पर  रास्ते में एक स्थान पर चने और सरवत का मुफ्त वितरण चल रहा था, इसलिए प्रत्येक बस पांच मिनट के लिए रुक रही थी, इसके बाद हम ज्वालादेवी पहुंचे, पहुँच कर होटल में कमरा तलाश किया, बड़े ही महंगे थे, पिछलीबार डेढ़ सौ रुपये में जिस होटल में कमरा मिल गया था आज वो पांच सौ रुपये मांग रहा था। बड़ी मुश्किल से पांच सौ रुपये में दो अलग अलग रूम मिल गए, चौधरी गेस्ट हाउस में।

काँगड़ा दुर्ग




काँगड़ा दुर्ग 

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      मंदिर के ठीक सामने से एक रास्ता काँगड़ा के किले के लिए भी जाता है, यहाँ से किला तीन किमी दूर है । मैं, कुमार, बाबा और मंजू चल दिए काँगड़ा के किले को देखने के लिए, शुरुआत में रास्ता चढ़ाई भरा है फिर बाद में एक सड़क आती है जो सीधे पुराने काँगड़ा की ओर गई है और वही पर है काँगड़ा का किला, रास्ता बिलकुल सुनसान था, रास्ते में हमें एकाध गाडी देखने को मिली और एक या दो लोग जिनसे हमने किले की दूरी भी पूछी। मैं चलता ही जा रहा था, वाकी तीनो मेरे काफी पीछे ही रह गए थे, मेरा तेज चलने का कारण था जल्दी वापद भी लौटना, हमें आज ही ज्वालादेवी के लिए भी निकलना था ।

मैक्लोडगंज की ओर



 मैक्लोडगंज की ओर


हिमाचल परिवहन की एक बस 



                 जाने वाले यात्री -  सुधीर उपाध्याय , कुमार भाटिया , सुभाष चंद गर्ग , मंजू  एवं  खुशी । 
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     मैंने घड़ी में देखा दोपहर के डेढ़ बजे थे, अचानक मन कर गया कि धर्मशाला और मैक्लोडगंज घूम के आया जाय, कौनसा यहाँ रोज रोज आते हैं, मैंने सभी से पुछा पहले तो कोई राजी नहीं हुआ, मैंने प्लान कैंसिल कर दिया, बाद में कुमार और मंजू का मन आ गया, अनके साथ बाबा और ख़ुशी भी राजी हो गए। सो चल दिए आज एक नई यात्रा पर काँगड़ा से धर्मशाला। धर्मशाला, काँगड़ा से करीब अठारह किमी है ऊपर पहाड़ो में और उससे भी आगे चार किमी ऊपर है मैक्लोडगंज।

Thursday, June 20, 2013

नगरकोट धाम 2013


नगरकोट धाम 2013 

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   बैजनाथ से आखिरी ट्रेन पकड़कर हम शाम तलक काँगड़ा मंदिर स्टेशन पहुंचे, यह नगरकोट धाम का स्टेशन है, यहाँ से नगरकोट मंदिर तीन चार किमी दूर है, स्टेशन से बाहर निकल कर एक नदी पड़ती है जिसपर अंग्रेजों के समय का रस्सी का पुल बना है जो हिलाने पर जोर से हिलता भी है , यहाँ से आगे टेम्पू खड़े मिलते है जो दस रुपये प्रति सवारी के हिसाब से मंदिर के दरवाजे तक छोड़ देते हैं, और यहाँ से बाजार युक्त गलियों में होकर मंदिर तक पहुंचते हैं, यह माँ बज्रेश्वरी देवी का मंदिर है, और एक प्रख्यात शक्तिपीठ धाम है, यह उत्तर प्रदेश की कुलदेवी हैं कहलाती हैं, भक्त यहाँ ऐसे खिचे चले आते हैं जैसे चुम्बक से लोहा खिंचा चला आता है। मंदिर में आने पर एक अलग ही अनुभव सा होता है ।

बैजनाथ धाम में इस बार




बैजनाथ धाम में इस बार 

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     जोगिन्दर नगर से हम बैजनाथ की ओर रवाना हुए, जोगिन्दर नगर की ओर आते वक़्त जो उत्साह हमारे अन्दर था अब वो सुस्ती में बदल चल गया, ट्रेन खाली पड़ी हुई थी सभी बैठने वाली सीटों पर लेट कर आ रहे थे, समय भी दोपहर का था और यहाँ गर्मी का तापमान अपने चरमोत्कर्ष पर था। इसीलिए कुमार भी सो गया, परन्तु मुझे ट्रेन में नींद बहुत ही कम आती है, मैं अब यहाँ से हमारी यात्रा लौटने की शुरू हो चुकी थी, और मैं लौटते हुए हिमालय की इन घनी वादियों को बाय बाय कह रहा था ।

Wednesday, June 19, 2013

Joginder Nagar




चामुंडा मार्ग से जोगिन्दर नगर की ओर 

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      आज सुबह मैं चार बजे ही उठ गया, नित्यक्रिया से न्रिवृत होकर मैंने सभी को जगाया और जल्दी से तैयार होने के लिए कहा, कारण था स्टेशन से जोगिन्दर नगर जाने वाली पैसेंजर को पकड़ना, जो सवा सात बजे चामुंडामार्ग स्टेशन आजाती है, इसके बाद जोगिन्दर नगर के लिए अगली ट्रेन शाम को पौने चार बजे थी जो हमारे किसी मतलब की नहीं थी। हम सभी जल्दी से तैयार होकर चामुंडामार्ग स्टेशन पहुंचे, अपने निर्धारित समय पर ट्रेन भी आ पहुंची, हमने इस बार भी अलग अलग डिब्बों में स्थान ग्रहण किया और चल दिए जोगिन्दर नगर की ओर ।

Chamunda Devi Temple '13




चामुंडा देवी के मंदिर में 

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     ट्रेन से उतरकर सभी ने राहत की सांस ली, मानो ऐसा लगा जाने कितने दिनों बाद धरती पर पैर रखा है। कुमार की बुआ और बहिन तो अपनी चादर बिछाकर लेट गईं और वाकी सब भी ऐसे ही बैठ गए, चामुंडा मार्ग एक छोटा सा स्टेशन है, ट्रेन के जाने के कुछ ही समय बाद स्टेशन बिलकुल खाली हो गया, गर अब स्टेशन पर कोई मुसाफिर बचा तो वो हम ही लोग थे, स्टेशन के ठीक सामने पहाड़ है जिसके नीचे एक छोटी सी नदी बहती है। स्टेशन पर हमें काफी समय हो चुका था अब समय था माँ के दरबार में हाजिरी लगाने का , यह हमारी कांगड़ा यात्रा का पहला पड़ाव स्थल था जहाँ आज रात हमें ठहरना था ।

Tuesday, June 18, 2013

काँगड़ा वैली पैसेंजर ट्रेन यात्रा



काँगड़ा वैली पैसेंजर ट्रेन यात्रा 

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      पठानकोट से ट्रेन सुबह दस बजे प्रस्थान कर चुकी थी, मैं और कुमार लेड़ीज कोच के दरवाजे पर बैठे हुए थे, कुमार पहली बार नेरो गेज की ट्रेन में बैठा था, गाड़ी की स्पीड और प्रकृति के नज़ारे देखकर उसे काफी प्रशन्नता हो रही थी, मेरे साथ आये सभी लोगों को जहाँ और जैसे जगह मिली घुस गए, ट्रेन में एक भी ऐसी जगह नहीं बची थी जो खाली हो। डलहौजी रोड के बाद ट्रेन कंडवाल स्टेशन पहुंची, यह एक छोटा स्टेशन है यहाँ एक देवी माता का मंदिर भी है जिनका नाम है नागिनी माँ ।

पठानकोट की तरफ




   पठानकोट की तरफ 

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     समता एक्सप्रेस के आने से पांच मिनट पहले ही हम स्टेशन पहुँच गए थे, आज ट्रेन अपने निर्धारित समय से पहले ही आ गयी थी, हमने अपनी सीट पर अपना स्थान ग्रहण किया और चल दिए निजामुद्दीन की ओर। मुझे इस यात्रा मैं कल्पना को अपने साथ ना लाने का बड़ा ही दुःख रहा, हम निजामुद्दीन पहुंचे, समता एक्सप्रेस की सेवा यहाँ समाप्त हो गयी। यहाँ से हमें एक लोकल मिली जो शकूरबस्ती जा रही थी , हम इसी लोकल में चढ़ लिए,यह प्रगति मैदान पर आकर खड़ी हो गयी, वैसे यहाँ बहुत ही कम ट्रेनों का स्टॉप है और ये सभी ट्रेन लोकल ही कहलाती हैं। कांगड़ा 

Monday, June 17, 2013

काँगड़ा यात्रा - 2013


   काँगड़ा यात्रा - 2013 

      करीब दो साल से ज्यादा समय हो गया था इसबार बिना काँगड़ा गए हुए, इसलिए आगरा के इस बढ़ते हुए गर्म तापमान को देखकर काँगड़ा जाने का विचार मन में आया, माँ से यात्रा की आज्ञा ली और माँ भी चलने के लिए तैयार हो गईं, बस वैष्णोदेवी जाने से इनकार कर दिया, क्योंकि अब उन्हें अत्यधिक चढ़ाई की जगहों से परेशानी होने लगी थी और वैसे भी पिछले दो साल पहले काँगड़ा यात्रा के दौरान हम वैष्णोदेवी होकर आये थे,
इस बार भी कुमार मेरे साथ था, और हमेशा की तरह इसबार भी बाबा और अम्मा मेरे साथ जाने को तैयार हो गए। मैंने अपना और कल्पना का रिजर्वेशन पहले ही करवा लिए था, पापाजी पास निकलवा लाये थे सो उनका रिजर्वेशन उनके पास पर हो गया, भारतीय रेलवे के पास पर फ्री में रिजर्वेशन हो जाता है ।

Friday, June 14, 2013

एटा पैसेंजर से एक यात्रा



एटा यात्रा 

   यूँ तो एटा आगरा के नजदीक ही है, दोनों में केवल 85 किमी का ही फासला है परन्तु मेरा एटा जाने का जब भी विचार बनता तो कोई न कोई अड़चन आ ही जाती थी और एटा जाने का विचार आगे के लिए खिसक जाता था एटा के लिए रास्ता टूंडला होकर गया है, और टूंडला से ही एक रेलवे लाइन बरहन होकर एटा के लिए गई है , जिस पर दिन में एक ही पैसेंजर ट्रेन चलती है जो टूंडला से एटा के २ चक्कर लगाती है, मेरा इस रेलवे लाइन को देखने का बड़ा ही मन था, पर कभी मौका नहीं मिल पाया । 

Friday, June 7, 2013

एक सफ़र रूपवास की ओर


एक सफ़र रूपवास की ओर

      आगरा से एक रास्ता जगनेर और तांतपुर की तरफ जाता है, रास्ते में रघुकुल कॉलेज भी पड़ता है जहाँ आज निधि का इतिहास का पेपर था, मैंने निधि को कॉलेज तक छोड़ दिया और इससे आगे चल दिया जगनेर की ओर। आगरा से जगनेर करीब पचास किमी दूर है, और उत्तर प्रदेश का आखिरी हिस्सा भी है जगनेर के तीनों ओर रूपवास की सीमा है, जगनेर से कुछ किमी पहले सरेंधी नामक एक चौराहा भी है जहाँ राजस्थान के भरतपुर से एक सड़क धोलपुर की ओर जाती है और उत्तरप्रदेश की एक सड़क तांतपुर से आगरा की ओर आती है अतः दोनों राज्यों की सडकों का मेल सरेंधी पर ही होता है मैं सरेंधी पहुंचा, यहाँ नाश्ते की कुछ दुकाने खुली हुई थी , मैंने दो कचोड़ी खाई और रूपवास की ओर चल दिया

Monday, April 15, 2013

अदभुत ग्राम धौरपुर


अदभुत ग्राम धौरपुर 

          धौरपुर ग्राम,  दिल्ली - हावड़ा रेल मार्ग पर स्थित हाथरस जंक्शन स्टेशन से 1 किलोमीटर दूर है। यह उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में स्थित है। हाथरस एक छोटा शहर है जिसकी सीमाए आगरा, मथुरा, अलीगढ, एटा तथा कासगंज से छूती हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती ने इसका नाम हाथरस से बदलकर महामाया नगर कर दिया था किन्तु उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनने के बाद इस जिले का नाम पुनः हाथरस रख दिया गया। पता नहीं क्यों मायावती जी को जिलों के नाम बदलने में बड़ा मजा आता है जैसे कासगंज को कांशीराम नगर बनाकर या अमरोहा को ज्योतिबा फुले नगर। खैर हमारे गाँव का नाम नहीं बदलने वाला वो तो धौरपुर ही रहेगा। फिर चाहे वो हाथरस जिले में आये या अलीगढ जिले में। 

Saturday, March 16, 2013

एक यात्रा मुरसान होकर


एक यात्रा मुरसान होकर 

     आज मैं और कुमार रतमान गढ़ी के लिए रवाना हुए । यह मेरी छोटी मौसी का गाँव है जो मथुरा कासगंज वाली रेल लाइन पर स्थित मुरसान स्टेशन से पांच किमी दूर है । आज माँ ने कहा जा अपनी मौसी के यहाँ से आलू ले आ । दरअसल मेरे मौसा जी एक किसान हैं और हरबार की तरह उनके खेतों में इसबार भी आलू हुए । इसलिए मैं भी चल दिया एकाध बोरी लेने और साथ मैं कुमार भी । 

     आगरा कैंट से होते हुए हम मथुरा पहुंचे और मथुरा से पैसेंजर पकड़कर सीधे मुरसान । मुरसान पूर्वोत्तर  रेलवे का स्टेशन है जिसका मुख्यालय बड़ा ही इज्ज़तदार है मतलब इज्ज़त नगर । जो बरेली में हैं । मथुरा से कासगंज वाली पैसेंजर ट्रेनों में अधिकतर भीड़ चलती है, कारण है सड़क मार्ग से कम समय और सस्ता किराया । परन्तु हम तो मथुरा से ही सीट पर बैठकर आये थे, बस उतरने में ही थोड़ी परेशानी हुई । 

Wednesday, February 20, 2013

कन्याकुमारी





भारत का अंतिम छोर - कन्याकुमारी 

कन्याकुमारी 
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      किला पैसेंजर से  सुबह चार बजे हम नागरकोइल स्टेशन पहुंचे । कन्याकुमारी यहाँ से पंद्रह किमी दूर थी , स्टेशन के बाहर आकर हमने दो ऑटो किराये पर किये बस स्टैंड के लिए, बस स्टैंड स्टेशन से एक दो किमी की दूरी पर था, पहले पता होता तो पैदल भी आ जाते। बस स्टैंड पर कन्याकुमारी की बस तैयार खड़ी थी, बस ने हमें सुबह 5 बजे कन्याकुमारी उतार  दिया। कन्याकुमारी की सबसे खास चीज़ है यहाँ का सूर्योदय जिसे देखने दूर दूर से लोग यहाँ आते हैं, आज मुझे भी ये मौका मिलने वाला था, कन्याकुमारी में बस से उतारकर मैं सीधे समुन्द्र के किनारे पहुंचा और सूर्योदय का इन्तजार करने लगा, यहाँ पहले से भी अधिक संख्या में पर्यटक बैठे हुए थे और सूर्योदय होने का इंतजार कर रहे थे ।

मदुरै यात्रा




                                                मीनाक्षी मंदिर - मदुरै की शान 


मीनाक्षी मंदिर 

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   सुबह पांच बजे हम मदुरै पैसेंजर से मदुरै की तरफ रवाना हुए, एक्सप्रेस ट्रेनों की अपेक्षा पैसेंजर ट्रेनों मे आपको लोकल संस्कृति देखने को मिल सकती है, क्योंकि वो जिस राज्य में से होकर गुजरती है उसकी सवारियां भी अधिकतर उसी राज्य की होती हैं। हमारे आसपास भी तमिलनाडु के ही लोग बैठे हुए थे जो आपस में बातें करते जा रहे थे , क्या बातें कर रहे थे ये मेरी समझ से बाहर था, और हम भी आपस में जब हिंदी बोल रहे थे तो वे भी नहीं समझ पा रहे थे, गर मुझे उनसे कुछ पूछना होता था तो इंग्लिश का प्रयोग करना पड़ता था। आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाओ इंग्लिश आपका हर जगह साथ देगी, शायद इसीलिए इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा कहा जाता है ।

CHANDERI PART - 3

चंदेरी - एक ऐतिहासिक शहर,  भाग - 3 यात्रा को शुरू से ज़ारी करने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये ।     अब हम चंदेरी शहर से बाहर आ चुके...