Sunday, July 30, 2017

Narayani Temple




नारायणी माता मंदिर - नारायणी धाम



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    टहला से अजबगढ़ जाते समय हम एक ऐसे स्थान पर आकर रुके जहाँ चारों और घने पीपल के वृक्ष थे, यह एक चौराहा था जहाँ से एक रास्ता नारायणी माता के मंदिर के लिए जाता है जो यहाँ से कुछ ही किमी दूर है। हमने सोचा जब ट्रिप पर निकले ही हैं तो क्यों ना माता के दर्शन कर लिए जाएँ और यही सोचकर हम नारायणी धाम की तरफ रवाना हो गए। यहाँ अधिकतर लोग लोकल राजस्थानी ही थे और इन लोगों में नारायणी माता की बड़ी मान्यता है। आज यहाँ मेला लगा हुआ था, काफी भीड़ भी थी और तरह तरह की दुकाने भी लगी हुईं थी।



     एक प्रसाद वाले की दुकान के पास हमने अपनी बाइक खड़ी कर दी और घुस गए भीड़ में नारायणी माता की एक झलक पाने के लिए। मैंने माता के दर्शन करने के पश्चात् ही अपनी यात्रा को सफल बनाया, वर्ना बिना दर्शन किये कैसी यात्रा। यहाँ मंदिर के सामने एक सुन्दर कुंड भी बना हुआ था।

नारायणी माता की कथा 

     माना जाता है कि यह वो स्थान है जब माता पार्वती अपने पिता राजा दक्ष के हवन कुंड में प्रवेश करके सती हो गई थी और भगवान शिव उनके अधजले शरीर को लेकर ब्रह्मांड में घूमकर विलाप कर रहे थे तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के कई टुकड़े कर दिए। वो शरीर के टुकड़े धरती पर जहां जहां गिरे वो स्थान आज शक्तिपीठ धाम बन गए। वर्तमान नारायणी धाम में सती का शरीर गिरा और यह स्थान नारायणी धाम बन गया।

      यह स्थान मान्यता में तब आया जब कलियुग में कर्णेश जी अपनी पत्नी कर्मावती को विदा कराकर अपने घर ले जा रहे थे तो काफी चलने के कारण थक कर वो एक स्थान बरगद के वृक्ष के नीचे बैठ गए और उन्हें नींद आ गई। कर्मावती जी अपने पति के चरणों के पास पर्दा करके बैठ गई। कुछ समय बाद वहां एक सर्प निकला और कर्णेश जी को डस लिया। कर्मावती को यह पता ही नहीं चला, जब सूर्य अस्त होने लगा किन्तु कर्णेश जी की आँख नहीं खुली तो कर्मावती जी को चिंता हुई , जब उन्होंने अपने पति जगाया तो देखा उनके मुख से झाग निकल रहे थे। अपने पति को चिरनिद्रा में जाते देख कर्मवती ने काफी विलाप किया। अपना रूप ऐसा बना लिया जिसे देखकर लग रहा था कि यह कोई दैवीय शक्ति हों।

     जंगल में गाय चरा रहे ग्वाल वालों के जरिये चिता तैयार की गई और कर्मावती अपने पति के साथ ही चिता पर बैठ गईं। चिता पर बैठी हुई कर्मावती से ग्वालों ने प्रार्थना की कि हे माता यहाँ दूर दूर तक पानी नहीं है तो माता ने एक लकड़ी एक ग्वाले को दी और कहा कि इसे लेकर जाओ और पीछे मुड़कर मत देखना, तुम्हारे पीछे भगवान की कृपा से गंगा आती दिखेगी। ग्वाला उस लकड़ी को लेकर कुछ ही दूर भागा था कि अचानक उसके मन में शंका उत्पन्न हुई की गंगा आ भी रही है या नहीं, उसने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा तो गंगा वही रूककर लुप्त हो गई। आज भी इस स्थान पर गंगा की वो छोटी सी नहर देखी जा सकती है जिसके पानी का स्त्रोत किसी को भी पता नहीं चलता है कि वो कहाँ से आया और कहाँ चला जाता है।

      कर्मावती को सती होने से पूर्व भगवन शिव और माता पार्वती ने दर्शन दिए और यह वरदान दिया कि आजके बाद यह स्थान नारायणी धाम के नाम से जाना जायेगा और जो भी प्राणी यहाँ सच्चे मन से अपनी मुराद माँगेगा वो अवश्य पूरी होगी। कर्मावती अपने पति की जलती हुई चिता में खुद जलकर सती हो गईं और यह स्थान तीर्थ बन गया और माता कर्मवतो को नारायणी माता के नाम से पूजा जाने लगा।
         जय माता नारायणी देवी 



नारायणी धाम चौराहा 

पीर शंकर नाथ योगाश्रम 

नारायणी द्धार 

नारायणी धाम 

नारायणी धाम 

गंगा कुंड 


श्री नारायणी माता मंदिर 

श्री नारायणी माता 

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