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Tuesday, June 4, 2019

Return from Shri Kedarnath


श्री केदारनाथ जी से मथुरा वापसी ( एक चमत्कारिक यात्रा )





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केदारनाथ नगर में भ्रमण :-
सुबह से शाम तक लाइन में लगे रहने के बाद आख़िरकार मुझे मेरे आराध्य भगवान शिव के केदारनाथ जी   के दर्शन हो ही गए।  दर्शन से मन को तृप्त करने के बाद मैंने भीमशिला के भी दर्शन किये जिसने त्रासदी के समय केदारनाथ मंदिर जी रक्षा की थी और फिर मैंने केदारनाथ नगर का भ्रमण किया जो मात्र साल में छः महीने ही गुलजार रहता है बाकी छः महीने यह बर्फ के आगोश में छिप जाता है। त्रासदी के समय यहाँ अत्यधिक विनाश हुआ था जिसके निशाँ उस दर्द की कहानी आज भी बयां करते नजर आते हैं। नगर भ्रमण करने के बाद अब मुझे भूख भी लग आई थी, राजस्थान वालों का यहाँ विशाल भंडारा चल रहा था जिसमे स्वादिष्ट भोजन और कुछ जलेबी खाकर अब मैं वापस अपने घर की तरफ लौट लिया था किन्तु मुझे क्या पता था कि घर अभी बहुत दूर था।

केदारनाथ जी से वापसी :-
केदारनाथ से लिंचोली तक आते आते अब मैं बहुत ही बुरी तरह से थक चुका था, पहाड़ उतरते समय आज मुझे पहली बार एहसास हुआ कि पहाड़ से उतरना, पहाड़ पर चढ़ने से भी ज्यादा मुश्किल होता है। इन खाली घोड़ों को यूँ नीचे की तरफ जाते देख कभी कभी मन करता की क्यों ना इन्हीं एक घोड़े पर बैठकर मैं भी निकल जाऊं परन्तु जब जेब का ख्याल आता तो पता चला कि पैसे तो पैदल चलने के लायक भी नहीं बचे थे आज, जो आखिरी बीस रूपये थे उसका भी मैं प्रसाद ले आया था, अब तो बस मेरी मंजिल माँ ही थी जो इसवक्त भीमबली में थी और शायद मेरे अन्य सहयात्री विष्णु भाई और त्रिपाठी जी भी मुझे वहीँ मिले। शाम हो चुकी थी और अब सूर्य का प्रकाश धीरे धीरे घाटी में से प्रस्थान कर रहा था और अँधेरे का आगमन शुरू हो चुका था। अँधेरे में ये पहाड़ और भी खतरनाक हो जाते हैं और मुझे फिर इन पहाड़ों से डर लगने लगता है।

Shri Kedarnath Jyotirling


श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग यात्रा 2019 


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   पर्वतराज हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों पर साक्षात् ईश्वर का वास माना जाता रहा है, इसलिए हिमालय  देवभूमि कहलाता है। हिमालय के उत्तराखंड राज्य में हिन्दुओं के मुख्य तीर्थ स्थल चार धाम स्थित हैं जिनमें श्री बद्रीनाथ जी, केदारनाथ जी, गंगोत्री और यमुनोत्री हैं। इनके अलावा यहाँ हर कोस पर किसी न किसी देवता का मंदिर भी स्थित है। श्री केदारनाथ जी भारतवर्ष के मुख्य बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं जिनका दिव्य मंदिर हिमालय की केदार नामक ऊँची चोटी पर स्थित है। केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के मंदिर के बारे में विख्यात है कि इस प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था जो पर्वत की 11750 फुट की ऊँचाई पर स्थित है।

Monday, June 3, 2019

Gourikund to Lincholi


 श्री केदारनाथ मार्ग और मेरे अनुभव - गौरीकुंड से बड़ी लिंचोली



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   अब चढ़ाई शुरू हो चुकी थी और मेरा संपर्क अब प्रकृति के साथ हो चला था, भोलेनाथ के भक्तों की भीड़ के साथ साथ अब मैं भी भोलेनाथ के दरबार की तरफ बढ़ने लगा था कि अचानक मुझे याद आया कि माँ का पर्स और उनका बैग तो मेरे पास ही रह गया था जिसका मतलब था कि अब उनके पास एक पैसा भी नहीं था जिससे वो कहीं किसी दुकान पर चाय पी लें या कुछ खा लें, जब कि वो तो डायबिटीज की मरीज हैं उन्हें भूख बहुत ही जल्द लग आती है, अब कैसे होगा, क्या होगा बस कुछ ऐसे ही विचारों को अपने दिमाग में सोचते हुए मैं आगे बढ़ रहा था, एक तरफ मुझे माँ से बिछड़कर दुःख भी हो रहा था और दूसरी तरफ मन ये सोच कर खुश भी था कि जो भी हो अब मेरी माँ घोड़े पर बैठकर मंदिर तक तो पहुँच ही जाएगी। 

   मैं भी मंदिर पर पहुँच जाऊंगा जहाँ मेरी मुलाकात माँ से हो जाएगी बस चिंता इसी बात की रहेगी कि उनके पास पैसे नहीं हैं परन्तु हो सकता है भोलेनाथ कोई चमत्कार ही कर दें, मेरे अन्य सहयात्री जो कल के भोलेनाथ से मिलने गए हुए हैं उनकी भेंट माँ से हो जाए और फिर उन्हें कोई परेशानी ना हो।

Sunday, June 2, 2019

Sonprayag



केदारनाथ यात्रा 2019  -  सोनप्रयाग से गौरीकुण्ड


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    स्टेटबैंक के एटीएम के बाहर रातभर जमीन पर सोने के बाद मेरी आँख सुबह जल्दी ही खुल गई, दरअसल मैं रात को ठीक से सो ही नहीं सका और सुबह होने की प्रतीक्षा करता रहा था, दिल में भोलेनाथ से मिलने की लालसा अब उनके द्वार पर आकर और भी तीव्र हो चली थी, अब बस ऐसा लग रहा था कि बस जल्दी से चढ़ाई शुरू कर दूँ और केदारनाथ बाबा के मंदिर पर जाकर माथा टेकूँ, बस ऐसा सोच ही रहा था कि सबसे पहले नहा धोकर तैयार आचार्य विष्णुजी ने बताया कि ऊपर चढ़ाई शुरू करने से पहले रजिस्ट्रेशन करवाना होगा, तभी चढ़ाई शुरू होगी। रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए और अपनी

   आगे की यात्रा को अंतिम पड़ाव तक पहुँचाने केलिए हम सभी सोनप्रयाग स्थित रजिस्ट्रेशन काउंटर पर पहुंचे। यह सोनप्रयाग में केदारनाथ मार्ग में स्थित है। यहाँ पहुंचकर देखा तो बहुत ही लम्बी लाइन लगी हुई थी, माँ को चाय की दुकान पर बैठाकर हम रजिस्ट्रेशन हेतु लाइन में लग गए, एक घंटे लाइन में लगे रहने के बाद हमें पता चला कि यह रजिस्ट्रेशन हम अपने मोबाइल में भी स्वतः ही कर सकते हैं, लाइन से हटकर हमने अपना अपना रजिस्ट्रेशन किया और जय बाबा केदारनाथ का जयकारा लगाकर हम गौरीकुंड के लिए बढ़ चले।

Saturday, June 1, 2019

Haridwar 2019


केदारनाथ यात्रा 2019 - हरिद्वार से सोनप्रयाग बस यात्रा


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शाम को गंगा स्नान करने  के बाद हम धर्मशाला पहुंचें और अपने अपने घरों से जो कुछ हम खाने को लाये थे उसे ही खाकर अपने बिस्तर लगाकर सो गए।  त्रिपाठी जी धर्मशाला की सबसे  ऊपर की छत पर जाकर सो गए जहाँ इस जून के महीने में भी हमें  ठंडी हवा रात को लगी रही थी। सुबह तड़के ही हम सब उठकर नहाधोकर बस स्टैंड की तरफ निकल गए। बस स्टैंड पहुंचकर देखा तो बद्रीनाथ जाने वाली उत्तराखंड की एकमात्र रोडवेज बस निकल चुकी थी, इसलिए बस स्टैंड के बाहर से ही चलने वाली एक प्राइवेट बस में हमने अपनी अपनी सीट बुक कर लीं। 

सुबह आठ बजे  के आसपास बस हरिद्वार से रवाना हो चली, यह बस अगस्तमुनि तक ही जा रही थी। अगस्तमुनि रुद्रप्रयाग से आगे केदारनाथ जाने वाले मार्ग में पड़ता है। ऋषिकेश निकलने के पश्चात् बस अब पहाड़ों की तरफ अपना रुख कर रही थी। यही वो पहाड़ थे जिनमें जाने का सपना मैं काफी समय से देख रहा था। गोलाकार घुमावदार सड़कों पर बस में बैठकर यात्रा करने का आनंद ही कुछ और होता है, गंगा नदी अब काफी नीचे गहरी घाटी में बहती हुई दिखाई दे रही थी। जितना यहाँ यात्रा करने में आनंद आता है उतना ही बस की खिड़की से गंगा ज की गहरी घाटी को देखकर डर भी लगता है। यह उत्तराखंड के पहाड़ हैं और उत्तराखंड एक देवभूमि है यहां जहाँ कहीं भी नजर जाती है वहीँ ईश्वरीय शक्ति आभास अनायास ही होने लगता है। 

Friday, May 31, 2019

Ujjaini Express Trip


केदारनाथ यात्रा 2019 - मथुरा से हरिद्वार रेल यात्रा 




   वक़्त बस गुजरता ही जा रहा था और मैं अभी भी हरिद्वार से ऊपर पहाड़ों में अपने आराध्यों के दर्शन करने नहीं जा पाया था। मेरे अन्य घुमक्क्ड़ साथियों ने उत्तराखंड का चप्पा चप्पा छान रखा था और मैं अभी सिर्फ हरिद्वार और ऋषिकेश तक ही सीमित था, कारण था कि मैं पहली बार वहां अकेला नहीं जा सकता था, मेरे साथ मेरी माँ अधिकांशतः मेरी सहयात्री रही हैं और उनके साथ मैंने 12 ज्योतिर्लिंग पूरे करने का प्रण लिया है जिसमे से दस ज्योतिर्लिंग हम कर चुके हैं। सबसे ज्यादा मुश्किल और कठिन यात्रा जिस ज्योतिर्लिंग की मुझे लगती थी वो श्री बाबा केदारनाथ जी थे क्योंकि यहाँ अधिकतर पैदल और ऊँचाई सहित ट्रैकिंग है, जो मुझे माँ के लिए पर्याप्त नहीं लग रही थी किन्तु जब प्रण लिया है तो जाना तो पड़ेगा ही अगर बाबा नहीं भी बुलाएँगे तो भी हम जायेंगे। बस ऐसा ही सोचकर मैंने एक गलत महीना यात्रा के लिए निश्चित किया और ये महीना जून था। 

Friday, June 29, 2018

Kathgodam to Mathura Bike Trip



काठगोदाम से मथुरा की ओर

THANKS VISIT FOR UTTRAKHAND



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      रात को काफी देर से सोने के बाद भी मेरी आँख सुबह जल्दी खुल गई, वेटिंग रूम से बाहर निकलकर देखा तो यात्रियों का आना शुरू हो चुका था। मैंने जल्दी ही अपनी बाइक प्लेटफोर्म से हटाकर बाहर खड़ी कर दी और फिर वापस आकर कल्पना को जगाया। घड़ी में सुबह के पांच बज चुके थे। हम तैयार होकर साढ़े पांच बजे तक फ्री हो गए और मैंने सही साढ़े पांच बजे अपनी बाइक काठगोदाम से मथुरा के लिए रवाना कर दी। काठगोदाम के बाद हल्द्वानी उत्तराखंड का प्रमुख नगर है। यहाँ मैंने इस स्टेशन के भी कुछ फोटो लिए और फिर आगे बढ़ चला। 

Thursday, June 28, 2018

Kathgodam Railway Station



काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर एक रात 




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     नौकुचियाताल के बाद अब हमने घर वापस लौटने की तैयारी शुरू कर ली थी, मैं घर पर माँ को बताकर नहीं आया था कि मैं नैनीताल बाइक से ही जा रहा हूँ, इस यात्रा के दौरान मैं उनसे यही कहता रहा कि मैं ट्रेन से ही आया हूँ हालाँकि मैं यहाँ से और आगे की यात्रायें भी कर सकता था परन्तु अब मुझसे अपनी माँ से सच नहीं छिपाया जा रहा था और मैं इससे अधिक उनसे झूठ भी नहीं बोल सकता था। अब मेरे मन और दिल ने मुझे धिक्कारना शुरू कर दिया था इसीलिए मैंने अब वापसी की राह ही चुनी। मैं शीघ्र से शीघ्र घर लौट जाना चाहता था इसलिए नौकुचिया के बाद मेरी बाइक का रुख अब घर की तरफ हो चला था। 

      शाम करीब ही थी, थोड़ी देर में सूरज भी ढलने ही वाला था और हम अभी भी जमीन से बहुत ऊँचाई पर थे, मैं अँधेरा होने से पहले ही इन पहाड़ों से नीचे उतरजाना चाहता था इसलिए बाकी के सभी तालों को छोड़कर मैं काठगोदाम की तरफ रवाना हो गया जो कुमाँयू का प्रवेश द्धार था। मैं वापस भीमताल पहुंचा और यहाँ से मैंने नीचे की तरफ उतरना शुरू कर दिया, यह रास्ता देखने में अत्यंत ही खतरनाक था परन्तु शानदार भी था। गहरी घाटियों के बीच मेरी बाइक धीरे धीरे नीचे की तरफ उतर रही थी और मुझे यही लग रहा था कि बस थोड़ी देर में मैं काठगोदाम पहुँच जाऊँगा, परन्तु शायद मैं गलत था। काठगोदाम नीचे जरूर था किन्तु इतना भी पास नहीं था जितना मैं सोचता आ रहा था।  

     रास्ते में पहाड़ों पर मक्का की खेती भी एक शानदार नजारा थी, यहाँ मैंने कुछदेर रुककर गर्म गर्म भुटिया कल्पना को खिलाई और बारिश के रुकने का इंतज़ार किया। पहाड़ी बरसात का कोई भरोशा नहीं होता कभी भी शुरू हो जाती है कभी भी बंद। अँधेरा होने तक मैं काठगोदाम पहुँच चुका था, मैं पहली बार काठगोदाम आया था और आते ही तेज बारिश ने हमारा जोरदार स्वागत किया। एक बड़े पेड़ के नीचे हमने स्वयं को भीगने से बचाया। माँ से किये वादे के अनुसार मुझे यहाँ भी रेलवे का ही सहारा लेना पड़ा जो मैं इस यात्रा में शुरू से लेता ही आ रहा था। हम सबसे पहले रेलवे स्टेशन पहुंचे, यह पूर्वोत्तर रेलवे का आखिरी स्टेशन है और काफी शानदार बना हुआ है। बाइक बाहर खडी कर हम प्लेटफार्म पर पहुंचे और यहाँ अपना स्थान जमाकर कुछ देर मोबाइल फोन को चार्ज किया। 

     मैं कल्पना के लिए बाहर से एक होटल वाले से खाना पैक कराकर लाया, वो होटल वाला भी ब्रजभाषा बोल रहा था और उसका स्टाफ भी। मुझे यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि कुमांयूनी प्रदेश में मेरी ब्रजभाषा .. जो शायद कई दिन बाद मैंने सुनी थी, मैंने उस होटल वाले से पुछा तो उसने बताया कि वो फ़िरोज़ाबाद का रहने वाला है और इस होटल के मालिक भी फ़िरोज़ाबाद के ही हैं। जब उसे पता चला कि मैं मथुरा से यहाँ बाइक से आया हूँ तो वह बड़ा चकित हुआ और खुश भी इसलिए उसने मुझे खाना भी फिरउसी रेट से दिया जिस रेट से ब्रज में मुझे मिलना चाहिए था । मैं खाना लेकर स्टेशन पहुंचा, रानीखेत एक्सप्रेस चलने के लिए तैयार खड़ी हुई थी इसके बाद बाघ एक्सप्रेस का नंबर था। 

     बाघ एक्सप्रेस के चले जाने के बाद स्टेशन एक दम खाली हो गया। अब प्लेटफॉर्म पर हम और रेलवे के कुछ कर्मचारी ही बचे थे। माँ के रेलवे पास के जरिये मैंने वेटिंग रूम में ही अपना बिस्तर लगाया और कल्पना को सुला दिया। अब मुझे बाइक का भी कुछ इंतज़ाम करना था, यहाँ पार्किंग केवल दिन में ही लगती है रात के समय वहां कोई नहीं होता, इसलिए मैंने अपनी बाइक को प्लेटफॉर्म पर ही खड़ा कर दिया और आराम से सो गया।

काठगोदाम की तरफ लौटने में पहाड़ 


काठगोदाम की तरफ 

कुमाँयू 


काठगोदाम में एक चौराहा 

बरसात के रुकने तक इसी पेड़ के नीचे हम रुके रहे 


रात्रि के समय काठगोदाम स्टेशन का एक दृशय 

काठगोदाम रेलवे स्टेशन 

काठगोदाम पर रानीखेत 


काठगोदाम रेलवे स्टेशन 



नैनीताल यात्रा के अन्य भाग

Bhimtal & Noukuchiyatal



भीमताल और नौकुचियाताल



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    भुवाली से निकलकर मैं वापस पहाड़ों की तरफ चढ़ने लगा था, तभी अचानक मेरी नजर एक स्टीम इंजन पर पड़ी जो सड़क के किनारे खड़ा हुआ था, आश्चर्य की बात थी इतनी ऊंचाई पर रेलवे का स्टीम इंजन। फिर मेरी नजर उसके पास लगे एक बोर्ड पर पड़ी जिसपर लिखा था "WELCOME TO COUNTRY INN". ये वही होटल है जो मथुरा के पास कोसीकलां से कुछ आगे भी हाईवे पर स्थित है और वहां पर भी इसी प्रकार का एक स्टीम इंजन खड़ा हुआ है।  मतलब यह इंजन इस होटल की खास पहचान है, जहाँ कहीं भी ऐसा इंजन आपको ऐसे टूरिस्ट स्थलों पर देखने को मिले तो समझ जाना यह रेलवे की संपत्ति नहीं, कंट्री इन होटल की संपत्ति है।  हालाँकि इस होटल में बड़े बड़े लोगो का ही आना जाना होता है, हम जैसे मुसाफिरों का यहाँ क्या काम।  इसलिए इस इंजन के फोटो खींचे और आगे बढ़ चला।

Kainchi Dham



पर्वतीय फल बाजार भुवाली और कैंची धाम


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     श्री नैना देवी जी के दर्शन करने के पश्चात् दोपहर करीब दो बजे हम खाना खाकर नैनीताल से कैंचीधाम की तरफ निकल पड़े। कैंची धाम से पहले हम नैनीताल से कुछ दूर स्थित भुवाली पहुंचे।  भुवाली समुद्र तल से 1106 मीटर की ऊँचाई पर स्थित बहुत बड़ा पर्वतीय फल बाजार है। यहाँ से एक रास्ता अल्मोड़ा और रानीखेत के लिए गया है दूसरा मुक्तेश्वर की ओर , तीसरा भीमताल की तरफ और चौथा नैनीताल की तरफ जिस पर से हम अभी होकर आये हैं। सबसे पहले मैंने अपनी बाइक को अल्मोड़ा की तरफ मोड़ दिया जहाँ से मैं रानीखेत जाना चाहता था परन्तु समय की कम उपलब्धता की वजह से कैंची धाम तक ही सफर पूरा किया। भुवाली में पर्यटन दृष्टि से कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है परन्तु यहाँ की सुंदरता और प्राकृतिक वातावरण हर सैलानी को यहाँ आने के लिए विवश कर देते हैं।  

Nainital



नैनीताल की सैर



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       उत्तराखंड राज्य के कुमाँयू मंडल में समुद्र तल से 1938 मीटर की ऊँचाई पर स्थित नैनीताल विश्व पर्यटन के मानचित्र पर एक ऐसा पर्यटन स्थल है जहाँ सबसे अधिक झीलें हैं। नैनीताल उत्तराखंड का एक काफी बड़ा जिला है जिसकी स्थापना 1891 ईसवी में हुई। नैनीताल नगर तीन ओर से टिफिन टॉप, चाइनापीक, स्नोव्यू आदि ऊँची इंची पहाड़ियों से घिरा है। नैनीताल का ऊपरी भाग मल्लीताल और निचला भाग तल्लीताल कहलाता है।  वर्ष 1990 में नैनीताल के मल्लीताल में राजभवन या सचिवालय भवन की स्थापना की गई जिसका उत्तर प्रदेश की ग्रीष्म कालीन राजधानी के रूप में उपयोग किया जाता था। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद 9 नवंबर 2000 को इस भवन को उत्तराखंड के उच्च न्यायालय के रूप में परवर्तित कर दिया गया। 

Kaladhungi to Nainital



कालाढूंगी और नैनीताल की ओर बाइक यात्रा


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     बाजपुर से निकलने के बाद जंगली रास्ता शुरू हो जाता है, सड़क के दोनों ओर बड़े बड़े पेड़ों का घना जंगल है। काफी दूर तक यह जंगल हमारे साथ रहा। अगर हम रामनगर की तरफ जाते तो जिम कार्बेट नेशनल पार्क अवश्य जाते, मेरी बड़ी तमन्ना थी कि मैं यह पार्क देखूँ, परन्तु इस बार मंजिल कल्पना ने तय की थी और मुझे उसे उसी मंजिल पर ले जाना था इसलिए हमारी गाड़ी नैनीताल की ही और दौड़ रही थी।

     जिम कार्बेट एक बहुत बड़े शिकारी थे जिन्होंने इस क्षेत्र में कई बाघों को देखा था और उनके ऊपर अनेकों पुस्तकें भी लिखी हैं। हम कालाढूंगी पहुँच चुके थे, यहाँ से एक रास्ता रामनगर की तरफ भी जाता है और दूसरा नैनीताल की ओर। मुझे बाद में पता चला कि कालाढूंगी में जिम कार्बेट का घर भी था जिसे मैं नहीं देख पाया।
अन्यथा यह तो हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात थी कि इतिहास के इतने महान शिकारी और लेखक का घर हमने देखा हो परन्तु कोई बात नहीं अगली बार जब कभी यहाँ आना होगा तो अवश्य देखेंगे।

    हलकी हलकी धुप अब गुनगुनाने लगी थी, यहाँ आकर मौसम अब ऐसा लगने लगा था जैसा की सर्दियों में  दिखलाई पड़ता है। हरे भरे पेड़ पौधों के बीच यहाँ के घर और सड़कें देखने में अत्यंत ही रोचक लगते हैं। एक ताज शेविंग वाले के यहाँ मैंने अपनी शेविंग कराई और एक दूकान से चाय पीकर हम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चले थे। यहाँ से अब घाटों के रास्ते शुरू हो चुके थे, और हम पहाड़ों में ऊपर की तरफ चढ़ते ही जा रहे थे। 

     कई स्थानों पर मुझे बाइक पहले और दुसरे गेयर में भी चलानी पड़ी, क्योंकि मेरी बाइक ने अब तक मैदानी रास्ता तय किया था, पहाड़ी रास्ते पर चलना उसके लिए नई बात थी और इन रास्तों पर चलने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं थी फिर भी मैंने बड़े हिसाब से उसके द्वारा नैनीताल की यात्रा को पूरा किया। गोल घुमावदार और टेढ़े मेढ़े रास्तों पर पहली बाइक चलाना मेरे लिए किसी एडवेंचर से कम नहीं था। कुछ ही समय बाद मैं एक ऐसे स्थान पर पहुंचा जिसका दृश्य मैंने अपनी उत्तराखंड दर्शन की किताब में देखा था।

    यहीं मैंने अपना कैमरा पहली बार निकाला और उससे यात्रा के दौरान पहला फोटो कल्पना का खींचा और उसके बाद एक भुट्टे की दुकान के पास बाइक खड़ी करके और कल्पना को वहीँ बैठकर मैं उस दृश्य के फोटो खींचने निकल पड़ा। पहाड़ों से ऊपर उठते हुए बादलों को देखकर और उनके फोटो खींचकर सच में इस  बाइक यात्रा की सारी थकान कहाँ गायब हो गई पता ही नहीं चला।

    अभी हमें और भी आगे जाना था क्योंकि नैनीताल अभी दूर था इसलिए हम यहाँ ज्यादा न गँवाकर आगे की तरफ बढ़ चले। रास्ते के साथ अब ऊंचाई और भी बढ़ने लगी थी, मेरी बाइक ने अभी तक मैदानी सफर ही किया था, पहाड़ी रास्तों के लिए वो  तैयार नहीं थी इसलिए थोड़ी बहुत प्रॉब्लम मुझे उस वक़्त आई जब नैनीताल जाने के लिए जहाँ खड़ी चढ़ाई आ गई और बमुश्किल हमने इस चढ़ाई को पार किया। एक्टिवा और डिस्कवर जैसी अन्य बाइक आज मेरी एवेंजर को पीछे छोड़ रही थी क्योंकि ये बाइकें यहाँ के प्रतिदिन के अभ्यास में हैं और मेरी बाइक के लिए ये रास्ता एकदम से नया था।

कालाढूंगी की तरफ 

नैनीताल रोड 

कालाढूंगी 

नैनीताल रोड 

उत्तराखंड के खेत 


पर्वतीय मार्ग शुरू 

नैनीताल यात्रा 


पर्वतीय मार्ग, नैनीताल 

मेरी बाइक 

बाइक और वाइफ एक साथ 

पहाड़ों पर उठते हुए बादल 

दूर दिखाई देती एक झील 




अगली यात्रा - नैनीताल की सैर

नैनीताल यात्रा के अन्य भाग

Bazpur Railway Station



बाजपुर रेलवे स्टेशन और नैनीताल की तरफ 



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     मुरादाबाद की डोरमेट्री में बड़े बड़े मच्छरों के बीच मैं इस रात के ढलने और सुबह होने का इंतज़ार कर रहा था और इंतज़ार करते करते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला, जब सुबह उठा तो देखा घडी में पांच बज चुके थे, जल्दी से कल्पना को उठाया और हम तैयार होकर सुबह छः बजे मुरादाबाद से निकल पड़े, मैंने काशीपुर जाने की बजाय कालाढूंगी की तरफ बाइक का रुख कर दिया।

   टाण्डा होते हुए हम कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश की सीमा छोड़ चुके थे और उत्तराखंड में प्रवेश किया। यहाँ से हमें हिमालय के हरे भरे पहाड़ दिखने लगे थे। बाजपुर पहुंचकर मैंने गाड़ी में पेट्रोल डलवाया और पहलीबार मैंने PAYTM के जरिये भुगतान किया। बाजपुर उत्तराखंड में एक छोटा क़स्बा है और यहाँ सड़क के पास ही पूर्वोत्तर रेलवे का बाजपुर रेलवे स्टेशन भी है। इसी रेलवे स्टेशन पर रूककर हमने कुछ देर आराम किया और फिर आगे की और बढ़ चले। 

Sunday, July 2, 2017

देहरादून घंटाघर और वापसी




देहरादून घंटाघर और वापसी


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            नीलकंठ से लौटने के बाद अब हमारा प्लान मसूरी जाने का बना इसके लिए देहरादून पहुँचना जरुरी था, इसलिए हम सबसे पहले ऋषिकेश बस स्टैंड पहुँचे। यहाँ पहाड़ों में ऊपर जाने वाली बसें भी खड़ी हुई थी और कुछ बसें दिल्ली जाने के लिए भी खड़ी हुई थी। तभी  देहरादून की एक बस आई, साधना , भरत और मामी जी बस में चढ़ गए और मैं अपनी बाइक से देहरादून की तरफ रवाना हो गया। रास्ता शानदार था और घने जंगलों के बीच से होकर गुजरता है। डोईवाला के बाद जंगल समाप्त हो जाते हैं, और देहरादून का शहरीय क्षेत्र शुरू हो जाता है।

NEELKANTH MAHADEV : RISHIKESH



नीलकंठ महादेव और लक्ष्मण झूला

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           पिछले दो दिनों से लगातार बाइक चला रहा था और रात को गंगाजी के किनारे से भी थोड़ा लेट लौटा था इसलिए सुबह जल्दी आँख नहीं खुली और साढ़े छ बजे तक सोता ही रहा। मोबाइल रात को चार्जिंग में लगा दिया था इसलिए फुल चार्ज हो गया था। धर्मशाला के सामने ही गंगा जी थीं फटाफट नहाधोकर तैयार हो गया। गत रात्रि से अब सुबह गंगाजी का बहाब काफी तेज हो गया था और पानी भी काफी ठंडा था, इससे लगता है ऊपर पहाड़ों में काफी तेज बारिश हुई होगी। यहाँ के स्थानीय लोगों ने भी बताया था कि इस वक़्त पहाड़ों में तेज बारिश हो रही है, पहाड़ फिसलने का भी डर है। इसलिए बद्रीनाथ जाने का विचार अगली बार पर छोड़ दिया और नीलकंठ जाने का विचार बनाया।
 

Saturday, July 1, 2017

RISHIKESH 2017




ऋषिकेश धाम - वर्ष 2017 


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     चीला के रास्ते हम हरिद्धार से ऋषिकेश पहुंचे। साधना ऑटो के जरिये हमसे पहले ही पहुँच गई थी। ऋषिकेश साधु संतो की तपोस्थली है और उत्तराखंड के चारों धामों की तरफ जाने का प्रवेश द्वार है। चूँकि हरिद्धार को ही हरि का द्धार माना जाता है क्योंकि भगवान विष्णु का धाम बद्रीनाथ, भगवान शिव का धाम केदारनाथ दोनों ही जगह जाने के लिए यात्रा हरिद्धार से ही शुरू होती है ,परन्तु पहाड़ो पर चढ़ाई ऋषिकेश से ही शुरू होती है। आज ऋषिकेश का मौसम मनभावक हो रहा था, यहाँ ऊँचे ऊँचे पहाड़ों को देखकर एक बार तो दिल में आया कि अभी इन पहाड़ों पर चला जाऊं, परन्तु अभी हमें ऋषिकेश भी घूमना था।
   
     सबसे पहले हम त्रिवेणी घाट पहुंचे। यह एक सुन्दर और मनोहर घाट है जहाँ सामने कल कल करती हुई गंगा बहती है और उस पार हरे भरे पहाड़ देखने को मिलते हैं। हम काफी देर यहाँ रुके।यहाँ एक भगवत कथा का आयोजन भी था, गंगा के किनारे देवो की स्थली में भागवत कथा का श्रवण किस्मत से ही मिलता है ।  यहाँ घाट पर ही पार्किंग भी है जहाँ मेरी बाइक निःशुल्क खड़ी हुई। यहीं मैंने अपनी बाइक को भी गंगा स्नान भी कराया। शाम को आरती का वक़्त हो चला था काफी संख्या में लोग यहाँ एकत्र होने लगे। हमें यहाँ से अब रामझूला की तरफ निकलना था.

मायानगरी हरिद्धार में



मायानगरी हरिद्धार में 


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      स्टेशन से लौटकर सबसे पहले हमने एक धर्मशाला में दो कमरे लिए। यह दो सौ रूपये प्रति कमरे के हिसाब से थे। मोबाईल चार्ज करके हम हर की पैड़ी की तरफ चल दिए। गंगा आरती का समय हो चुका था पर जब तक हम वहां पहुंचे आरती हो चुकी थी। यह शुभ मौका मैं खोना नहीं चाहता था परन्तु किस्मत से ज्यादा किसी को नहीं मिलता। आज भी गंगा आरती देखना मेरे नसीब में नहीं थी। मैंने बाइक एनाउंसमेंट ऑफिस के बाहर खड़ी कर दी और गंगा स्नान करने घाट पर आ गया बाकी सभी लोग सुबह नहाएंगे। गंगा स्नान कर वापस हम धर्मशाला की तरफ चल दिए अब खाने का और सोने का समय हो चला था। धर्मशाला में बाइक खड़ी नहीं हो सकती थी इसलिए उसे मैं रेलवे स्टेशन पर स्टैंड पर खड़ी कर आया।

Friday, June 30, 2017

मथुरा से हरिद्धार बाइक यात्रा



मथुरा से हरिद्धार बाइक यात्रा

     मानसून का मौसम शुरू हो चुका था, मन में कई दिनों से इसबार बाइक से कहीं लम्बा सफर करने का मन कर रहा था परन्तु केवल पहाड़ों की तरफ। मेरे मन में इसबार नैनीताल जाने का विचार बना पर तभी आगरा से साधना ( मेरी ममेरी बहिन ) का फोन आया और उसने हरिद्वार जाने की इच्छा जाहिर की। मैं हरिद्धार पहले भी कई बार जा चुका हूँ परन्तु वह पहली बार हरिद्धार जा रही थी इसलिए नैनीताल जाने का विचार कैंसिल और हरिद्धार का प्लान पक्का। हालाँकि मैं इस बार बाइक से ही यात्रा करना चाहता था इसलिए मैंने इस यात्रा को थोड़ा और आगे तक बढ़ाने का विचार बनाया मतलब बद्रीनाथ जी तक।

CHANDERI PART - 3

चंदेरी - एक ऐतिहासिक शहर,  भाग - 3 यात्रा को शुरू से ज़ारी करने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये ।     अब हम चंदेरी शहर से बाहर आ चुके...