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Friday, April 17, 2020

SAI NAGAR SHIRDI



साईं नगर शिरडी 



6 जनवरी 2020                                                               इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

    हम करीब साढ़े नौ बजे शिरडी पहुँच गए थे, एक प्रसाद वाले की दुकान पर अपने बैग रखकर हम साईं बाबा के दर्शन करने लाइन में लग गए और दर्शन पर्ची लेकर साईं बाबा के दर्शन हेतु अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। आज काफी सालों बाद मेरी और साधना की मुलाकात बाबा से होने वाली थी। बहुत दिन हो गए थे बाबा से बिना मिले इसलिए अब जब हमारी यह यात्रा अंतिम चरण में थी तो दिल ने सोचा क्यों ना बाबा के दर्शन कर चलें। आखिर कार हमारी यह यात्रा धार्मिक यात्रा भी तो थी। 

    महाराष्ट्र प्रान्त के गोदावरी नदी के समीप शिरडी नामक ग्राम स्थित है जहाँ 18 वीं सदी में साईंबाबा का प्रार्दुभाव एक वृक्ष के नीचे हुआ था। साईंबाबा के बारे में प्रचलित है कि इनका जन्म और इनकी बाल्यकाल अवस्था अज्ञात है। इनका सबसे प्रथम दर्शन शिरडी वासियों को ही हुआ था, जब उन्होंने एक वृक्ष के नीचे एक दिव्यतेज युवा को ध्यानमग्न अवस्था में देखा। 

Tuesday, April 14, 2020

AURANGABAD TO SHIRDI


औरंगाबाद से शिरडी रेल यात्रा 




5 - 6 जनवरी 2020                                                             इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

    श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के बाद ऑटो वाले भाई ने हमें शाम को औरंगाबाद रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया। अब हमारी यात्रा की अगली मंजिल शिरडी की तरफ थी जिसके लिए हमारा रिजर्वेशन औरंगाबाद पर रात को ढाई बजे आने वाली पैसेंजर ट्रेन में था जो सुबह 6 बजे के करीब हमें शिरडी के नजदीकी रेलवे स्टेशन कोपरगाँव उतार देगी। 

    अभी ढ़ाई बजने में बहुत वक़्त था, इसलिए स्टेशन के क्लॉक रूम पर रखे अपने बैगों को लेकर हम वेटिंग रूम पहुंचे। औरंगाबाद रेलवे स्टेशन का वेटिंग रूम बहुत ही शानदार और साफ़ सुथरा था, अधिकतर यात्री यहाँ बेंचों पर बैठकर अपनी अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने यहाँ एक कोने में अपनी दरी और चटाई बिछाकर अपना बिस्तर लगाया और थोड़ी देर के लिए हम यहाँ आराम करने लेट गए। 

Monday, April 13, 2020

SHRI GHRISHNESHWAR JYOTIRLING


श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग 2020




5 जनवरी 2020                                                        इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। 

     एलोरा से थोड़ा सा आगे ही श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। मैं पहले भी एकबार माँ के साथ यहाँ आ चुका हूँ और आज दूसरी बार अपनी पत्नी को लेकर आया हूँ। ऑटो से उतरते ही मंदिर की ओर जाने वाली सड़क पर पूजा सामग्री की दुकानें लाइन से बनी हुई हैं। हमने सबसे पहली दुकान से ही पूजा सामग्री ले ली और जब थोड़ा सा आगे बढे तो पता चला सबसे शुरुआती दुकानदार अंदर वाले दुकानदारों की अपेक्षा काफी महँगा लगाकर सामान बेचते हैं इनमें अधिकतर सब महिलाएं ही थीं। मैंने मंदिर से लौटकर उस दुकानदार महिला को अपनी भाषा में अच्छी खासी सुनाई जिससे हमारे बाद आने वाले अन्य यात्रियों से वो इसप्रकार बेईमानी से सामान महँगा लगाकर न बेचे, और फिर भी बेचे तो वह उसका पाप ही होगा। 

Wednesday, April 8, 2020

KAILASH TEMPLE : ELLORA



कैलाश मंदिर : एलोरा गुफाएँ 




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5 जनवरी 2020 

    एलोरा गुफाओं का निर्माण राष्टकूट शासक कृष्ण प्रथम के शासनकाल में अजंता की गुफाओं को बनाने वाले कारीगरों के वंशजों ने किया था। एलोरा गुफाओं में के केवल बौद्ध ही नहीं अपितु हिन्दू और जैन धर्म से सम्बंधित अनेकों गुफाएं स्थित हैं। यह सभी गुफाएं अजंता की तरह ही चट्टानों को काटकर बनाई गईं हैं। 8वीं शताब्दी के मध्य एलोरा राष्ट्रकूट शासकों की राजधानी का मुख्य केंद्र रहा है जहाँ राष्ट्रकूट शासकों ने अनेकों गुफाओं का निर्माण कराया और हिन्दू होने के कारण उन्होंने यहाँ पहाड़ को काटकर एक ऐसे मंदिर का निर्माण कराया जिसका वर्णन भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से युक्त है। इस मंदिर की शिल्पकारी और मूर्तिकारी को देखकर ही इसकी भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है और यह मंदिर है एलोरा का कैलाश मंदिर। 

Tuesday, April 7, 2020

AURANGZEB TOMB



खुलदाबाद - औरंगजेब का मक़बरा



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5 जनवरी 2020 

     दौलताबाद का किला देखने के बाद हम एलोरा गुफाओं की तरफ आगे बढ़ गए। यहाँ रास्ता बेहद ही शानदार था, रास्ते के दोनों तरफ बड़े बड़े छायादार घने वृक्ष लम्बी श्रृंखला में लगे हुए थे। दौलताबाद की सीमा समाप्त होते ही, घाट सेक्शन शुरू हो जाता है और ऑटो अब अपनी पूरी ताकत से इन पहाड़ियों पर गोल गोल घूमकर चढ़ता ही जा रहा था। कुछ समय बाद हम एक मुसलमानों की बस्ती में पहुंचे। यह नगर खुलदाबाद कहलाता है जिसे मुग़ल सम्राट औरंगजेब ने बसाया था। यहां औरंगजेब का मकबरा एक साधारण सी मजार के रूप में स्थित है। इस स्थान के ऐतिहासिक महत्त्व को देखते हुए हम अपने धर्म के विपरीत इस स्थान को देखने गए।

Monday, April 6, 2020

DOULTABAD FORT


दौलताबाद का किला 


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5 जनवरी 2020 


   महाराष्ट्र प्रान्त के औरंगाबाद जिले से वेलूर स्थित एलोरा गुफाएं जाते समय रास्ते में एक शंक्वाकार आकार की पहाड़ी पर एक दुर्ग दिखाई देता है, यह दौलताबाद का किला है जिसे हिन्दू शासनकाल के दौरान देवगिरि के नाम से जाना जाता था। देवगिरि के इतिहास के अनुसार इस किले का निर्माण आठवीँ शताब्दी में यादव कुल के राजा भीमल ने कराया था। 8 वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तक इस दुर्ग पर यादववंशीय शासकों का अधिकार रहा और उसके पश्चात् यह दिल्ली के सुल्तानों के अधीन आ गया। इस मजबूत किले से जुड़ा इतिहास काफी दुःखद और दयनीय है। 

Sunday, April 5, 2020

BIBI KA MAQBARA


बीबी का मक़बरा 



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यात्रा दिनाँक :- 5 जनवरी 2020

    विश्व प्रसिद्ध मुगलकालीन ईमारत ताजमहल की तर्ज पर बना बीबी का मकबरा, असल में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी महान शासक औरंगजेब की पत्नी, दिलरस बानो बेग़म का मक़बरा है जिनका देहांत मुमताज़ महल की ही तरह जज्चा संक्रमण की वजह से सन 1657 में हो गया था। इनके मरणोपरांत इन्हें राबिया उदौरानी के नाम से जाना गया जिसका हिंदी अनुवाद 'उस युग की राबिया' है। 

    कई लोग इसे सम्राट औरंगजेब का मकबरा भी समझ लेते हैं किन्तु यह गलत है। बेग़म की मृत्यु के पश्चाय सम्राट औरंगजेब ने यहाँ एक सादा कब्र का निर्माण कराया और बाद में औरंगजेब के पुत्र शहजादा आज़मशाह ने इसे ताजमहल से भी सुन्दर बनवाने की कोशिश की किन्तु अत्यधिक व्यय के चलते औरंगजेब ने ऐसा नहीं होने दिया। 

Saturday, April 4, 2020

PANCHAKKI : AURANGABAD


पहुर से औरंगाबाद और पनचक्की 



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5 जनवरी 2020 

    अजंता की गुफाएँ देखने के बाद हम लोग महाराष्ट्र परिवहन की एक बस द्वारा पहुर के लिए रवाना हुए। इस बस में अत्यधिक भीड़ थी इसलिए मुझे बैठने के लिए सीट नहीं मिल सकी परन्तु अपने सहयात्रियों को मैंने आराम से अलग अलग सीटों पर बैठा दिया। पहुर पहुंचकर बस अपने स्टैंड पर खड़ी हो गई, यहाँ से पहुर रेलवे स्टेशन की दूरी 2 किमी थी और यह बस रेलवे स्टेशन होते हुए ही जलगाँव की ओर जा रही थी। मैंने इस बस के कंडक्टर और ड्राइवर महोदय से विनती की, कि हमें रेलवे स्टेशन के नजदीक उतार दें, परन्तु उन्होंने हमारा अनुरोध स्वीकार नहीं किया और हमें बस स्टैंड पर ही उतार दिया। हम पैदल ही रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ चले।

Friday, April 3, 2020

AJANTA CAVES


अजंता की गुफाएँ 



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यात्रा दिनाँक - 4 जनवरी 2020 
बौद्ध धर्म का उदय

भारतभूमि का इतिहास संसार की दृष्टि में अत्यंत ही गौरवशाली रहा है और अनेकों देशों ने भारत की संस्कृति, कला और धर्मक्षेत्र को अपनाया है। यह एक ऐसी भूमि है जहाँ विभिन्न तरह के परिधान, भाषा - बोली, संस्कृतियां और धर्म अवतरित होते रहे हैं। इसी भूमि पर भगवान विष्णु ने राम और कृष्ण के रूप में अवतरित होकर संसार को धर्म और मर्यादा का ज्ञान कराया, साथ ही महावीर जैन ने भी सत्य, अहिंसा और त्याग का ज्ञान देते हुए जैन धर्म का प्रसार किया। जैन धर्म के बाद एक ऐसे धर्म का उदय भारत भूमि पर हुआ जिसका ज्ञान लगभग जैन धर्म  के ही समान था और इसके प्रवर्तक विष्णु के ही अवतार माने गए और यह धर्म था - बौद्ध धर्म, जिसका ज्ञान गौतम बुद्ध ने संसार को दिया। 

Thursday, April 2, 2020

PAHUR RAILWAY STATION


अजन्ता की तरफ एक रेल यात्रा - मुंबई से पहुर



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3 जनवरी 2020

     मुंबई में दो दिवसीय यात्रा के बाद अब वक़्त हो चला था महाराष्ट्र प्रान्त के दर्शनीय स्थलों को देखने का, इसलिए बड़े बेरुखे मन से हमने मुंबई से विदा ली और हम लोकमान्य तिलक टर्मिनल स्टेशन से कुशीनगर एक्सप्रेस द्वारा पाचोरा के लिए रवाना हुए। कुशीनगर एक्सप्रेस में हमारा पाचोरा तक रिजर्वेशन कन्फर्म था और यह ट्रेन रात को दस बजे के आसपास पाचोरा के लिए रवाना हो गए। 

   आज हम पूरे दिन के थके हुए थे और अधिक से स्पॉटों को कवर करने के लिए हमने एक पल भी आराम नहीं किया था। इसलिए ट्रेन की सीट पर लेटते ही नींद ने हमें अपने आगोश में ले लिया और महानगर मुंबई से हम कब दूर हो गए पता ही नहीं चला।

Wednesday, April 1, 2020

KANHERI CAVES


कान्हेरी गुफाएँ


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    भारतवर्ष में बौद्ध धर्म का उदय होने के बाद, भारतीय लोगों की इस धर्म के प्रति आस्था को देखते हुए अनेकों मठ, विहार स्थल, स्तूप और पर्वतों को काट छाँट कर गुफाओं का निर्माण हुआ। यह स्थल बौद्ध लोगों और भिक्षुयों के लिए रहने और महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं के प्रसार प्रचार हेतु बनाये गए थे। प्राचीन भारत के सबसे बड़े साम्राज्य, मगध में मौर्य वंश के दौरान से ही इन सभी का निर्माण कार्य आरम्भ हुआ। मौर्य वंश के पतन के पश्चात भी अनेकों राजवंशों ने बौद्ध धर्म के प्रति अपनी आस्था बनाये रखी तथा इसे राजधर्म तक घोषित किया और ऐसे ही स्मारकों और गुफाओं का निर्माण होता रहा, जिनमें कुषाण और हर्षवर्धन का काल सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा। 

Sunday, March 3, 2019

Bhusaval Junction AND Goa Express

भुसावल जंक्शन और गोवा एक्सप्रेस 


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     मैं जामनेर से मारुती ओमनी वन से भुसावल पहुँचा। इस वक़्त दोपहर के बारह बजे हुए थे और मेरी वापसी की ट्रेन गोवा एक्सप्रेस जिसमे मैंने तत्काल में रिजर्वेशन कराया था 1 घंटे बाद आने वाली थी। वैन वाले ने मुझे स्टेशन के नजदीक ही उतारा था और यहीं स्टेशन के बराबर में बस स्टैंड भी था। मैं जब रेलवे स्टेशन के सामने पहुँचा तो मेरी नजर अपने देश के लहराते हुए राष्ट्रीय ध्वज तिरंगें पर पड़ी, बिना देर किये मेरा हाथ अपने राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देने के लिए उठ गया और मन एक बार फिर प्रसन्न हो गया। मेरा जूता आगे से काफी उधड़ चुका था इसलिए एक मोची की दुकान पर अपने जूतों की सिलाई कराइ 40 मिनट बर्बाद हुए। 

      अब ट्रेन आने में मात्र 20 मिनट ही बचे थे जबकि मुझे अभी नहा धोकर तैयार भी होना था क्योंकि मैं कल अमरावती में ही नहाया था, महाराष्ट्र की इस भीषण गर्मी में बिना नहाये हुए 24 घंटे से भी ऊपर हो चुके थे। मैं सीधे स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में गया और नहा धोकर तैयार होने ही वाला था कि तभी एनाउंस हुआ कि गोवा एक्सप्रेस 4 नंबर प्लेटफॉर्म पर आ चुकी है। मैं बिना बेल्ट बांधे ही और बिना बैग तैयार किये सीधे 4 नंबर प्लेटफोर्म पर पहुँचा। ट्रेन अपने निर्धारित समय पर स्टेशन पर पहुँच चुकी थी। मेरा रिजर्वेशन एस 8 कोच में था। सीट पर पहुंचकर मैं पूर्ण रूप से तैयार हुआ और स्वयं को तरोताजा महसूस किया। 

Jamner

पाचोरा से जामनेर नैरोगेज रेल यात्रा 




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     मच्छरों की वजह से रात भर सो नहीं सका इसलिए सुबह भी जल्द ही उठ गया और रेलवे पुल से उतर कर स्टेशन के बाहर आया। चाय वालों ने अपनी अपनी दुकानें खोल लीं थी और चाय की महक आसपास के वातावरण में इसकदर फैला दी थी कि कभी चाय ना पीने वाला इंसान भी उस महक को सूँघकर एकबार चाय पीने अवश्य आये। मैं तो प्रतिदिन सुबह की चाय पीता हूँ तो इस महक के साथ मैं भी खिंचा चला गया एक चाय की दुकान पर और देखा आजकल 1 घूँट वाले कप बाजार में उपलब्ध हैं जिनमें चाय की कीमत 7 रूपये तो लाजमी है कहीं गलती से आपने कह दिया कि एक कप स्पेशल चाय,  तो इसी कप की कीमत सीधे दस रूपये पर पहुँच जाती है। 

Pachora Junction

पाचोरा जंक्शन पर एक रात  




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     अब वक़्त हो चला था अपनी नई मंजिल की तरफ बढ़ने का, मतलब अब मुझे पाचोरा की तरफ प्रस्थान करना था। इसलिए मैं मुर्तिजापुर के बाजार से घूमकर स्टेशन वापस लौटा तो मैंने उन्हीं साईं रूप धारी बाबा को देखा जो कुछ देर पहले मेरे साथ अचलपुर वाली ट्रेन से आये थे। वो बाबा बाजार में जाकर मदिरा का सेवन करके स्टेशन लौटे और एक खम्भे से टकराकर गिर पड़े। स्थानीय लोगों ने उनकी मदद करने की कोशिश  बाबा ने वहीँ लेटे रहकर आराम करना उचित समझा। हालाँकि खम्भे से टकराकर बाबा का काफी खून भी निकला था  अंगूर की बेटी सारे गम भुला देती है।

Saturday, March 2, 2019

Shakuntla Railway

शकुंतला रेलवे की एक यात्रा 


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      अब वक़्त हो चला था नैरो गेज की इस ट्रेन में यात्रा करने का जिसके लिए ही मैं यहाँ आया था, इस रुट पर यात्रा करने का एक अलग ही उत्साह मेरे मन में था। टिकटघर से 15 रूपये देकर मुर्तिजापुर की टिकट लेकर मैं ट्रेन में सवार हो गया और एक लम्बी सीटी बजाकर और एक जोरदार झटका लेकर ट्रेन अचलपुर से रवाना हो चली। टोपी वाला रेलवे कर्मचारी ट्रेन के चलने से पहले ही स्टेशन से थोड़ी दूर स्थित रेलवे फाटक पर पहुँच चुका था जो अचलपुर-परतपाड़ा मार्ग पर स्थित था। उसे यहीं रह जाते देख मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि अब कोई मुझे फोटो खींचने से रोकने वाला नहीं होगा। 

Achalpur Railway Station


अचलपुर रेलवे स्टेशन 





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      अचलपुर किले से निकलने के बाद ऑटो वाले भाई ने मुझे अचलपुर रेलवे स्टेशन के बाहर छोड़ दिया। ऑटो वाले भाई से काफी देर बात करने के बाद एक अपनेपन जैसा नाता सा जुड़ गया था और इसका एहसास तब हुआ जब हम दोनों एक दूसरे दूर होने लगे थे। उसके जाने से पहले ही मैंने स्टेशन पर बने टिकटघर में बैठे बाबू से पूछ लिया था कि ट्रेन कितने बजे तक आयेगी। बाबू ने कहा अभी दस बजे हैं दो घण्टे बाद, मतलब बारह बजे तक। टिकटबाबू के इतना कहते ही मेरे दिल वो सुकून प्राप्त हुआ जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता। अब मुझे पक्का यकीन हो गया था कि ट्रेन तो आएगी और आखिरकार मेरे यहाँ आने का मकसद पूर्ण हो गया था। ऑटो वाले भाई को विदा कर मैं स्टेशन पर आकर बैठ गया। 

Achalpur Fort



अचलपुर किला 


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     मैं अमरावती से अचलपुर के लिए बस द्वारा रवाना हो चुका था और इस बस ने मात्र एक घंटे में मुझे अचलपुर पहुँचा दिया। अचलपुर, महाराष्ट्र के विदर्भ प्रान्त में अमरावती से 50 किमी उत्तर दिशा में स्थित है। यह एक प्राचीन शहर है जो एक किले के परकोटे के अंदर बसा हुआ है, ब्रिटिश कालीन समय में अंग्रेज़ इसे एलिचपुर कहा करते थे जो कालांतर में अचलपुर कहलाता है। अचलपुर से 5 किमी दूर परतपाड़ा इसका जुड़वाँ शहर है जो अमरावती से चिकलधरा जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है, यहाँ से सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखला भी दिखाई देने लगती है जिसपर मेलघाट के जंगल और मध्य प्रदेश की सीमा स्थित है। बस ने मुझे अचलपुर के मुख्य चौराहे पर छोड़ दिया और वापस अमरावती जाने के लिए खड़ी हो गई। मुझे यहाँ से रेलवे स्टेशन जाना था परन्तु उससे पहले मैं यहाँ स्थित किला देखना चाहता था। 

Amravati

  यात्रा का केंद्र बिंदु  - अमरावती 


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     अकोला से मैं अमरावती एक्सप्रेस में बैठ गया और इमरजेंसी खिड़की वाली सीट पर अपना स्थान ग्रहण किया। रेलवे के क्रिस ऍप में जब शकुंतला रेलवे का कोई भी टाइम शो नहीं हुआ तो मुझे लगा कि शायद अचलपुर जाने वाली नेरोगेज की ट्रेन बंद गई होगी परन्तु मुझे अपने बनाये यात्रा रूट के हिसाब से ही चलना था। अगला स्टेशन मुर्तिजापुर ही है और जब ट्रेन यहाँ पहुँची तो मेरी नजरों ने उस नेरोगेज की ट्रेन को तलाश करना शुरू कर दिया। वो सामने ही खड़ी थी पर पता नहीं जाएगी भी कि नहीं, बस यही सोचकर मैं ट्रेन से नहीं उतरा और इसी ट्रैन से अमरावती तक जाने का फैसला कर लिया। 

Akola Railway Station


अकोला रेलवे स्टेशन पर एक सुबह
2 मार्च 2019

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     मैं रात को गोंदिया से 12812 हटिया - मुंबई एक्सप्रेस में बैठा और सुबह चार बजे अकोला पहुँच गया। ट्रेन से उतरा तो ठण्ड सी लगने लगी, सीधे चाय की स्टाल पर गया। चाय पीते पीते मेरी नजर एक तेंदुए पर पड़ी। एक बार को तो मुझे लगा कि असली है पर उसके आसपास लगी रेलिंग देखकर मैं समझ गया यह एक तेंदुएं का बुत है जो काटेपूर्णा सेंचुरी में पर्यटकों को स्वागत पर बुलाता है। देखने में एकदम असली लगने वाले इस बुत को मैं देखता ही रहा और जब मन भर गया तो आगे चल पड़ा। स्टेशन की दीवारों पर मेलघाट टाइगर रिज़र्व के शानदार चित्र बने हुए हैं, इन्हें देखने पर एक बार को तो यही लगता है कि हम रेलवे स्टेशन पर नहीं बल्कि मेलघाट के जंगलों में हैं।   

Wednesday, August 10, 2016

Mumbai CST



मुम्बई - मेरी पहली यात्रा

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      एक बार मुम्बई देखने का हर किसी का सपना होता है, मेरा भी सपना था और साथ में मेरी माँ का भी । ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के पश्चात् हम सुबह मनमाड पहुंचे और राज्य रानी एक्सप्रेस पकड़कर मुम्बई सीएसटी ।
पहली बार मुम्बई देखने की एक अलग ही ख़ुशी थी आज मेरे मन में और इससे भी ज्यादा ख़ुशी थी अपनी माँ को मुम्बई दिखाने की। यूँ तो मैंने अपनी माँ को दिल्ली, कलकत्ता और चेन्नई तीनो महानगर दिखा रखे हैं पर  हर किसी के दिल में बचपन से ही जिस शहर को देखने का सपना होता है वो है मुम्बई । सीएसटी स्टेशन पर पहले मैंने और माँ ने भोजन किया और उसके बाद हम सीएसटी के बाहर निकले ।

     अंग्रेजों के समय में बना यह स्टेशन आज भी कितना खूबसूरत लगता है इसीलिए ये विश्व विरासत सूचि में दर्ज है। यहाँ हमने दोमंजिला बस भी पहली बार ही देखी थी। इसी बस द्वारा हम गेट वे ऑफ़ इंडिया पहुंचे। समुद्र तट पर स्थित यह ईमारत भी मुझे ताजमहल से कम नहीं लगी और साथ ही ताज होटल जिसे हम बचपन से टीवी अख़बारों में देखते आ रहे थे आज आँखों के सामने था ।

CHANDERI PART - 3

चंदेरी - एक ऐतिहासिक शहर,  भाग - 3 यात्रा को शुरू से ज़ारी करने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये ।     अब हम चंदेरी शहर से बाहर आ चुके...